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Showing posts from 2017

ईश्वर से प्रेम करना सिखाएं, डरना नहीं

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आस्थावानों के लिए ईश्वर एक सार्वभौमिक शक्ति है, जिसे विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। जिसे हम भक्ति कहते हैं, वो भी प्रेम का ही एक अंग है। प्रेम जब अपने चरम पर पहुंचता है, तो भक्ति में परिवर्तित हो जाता है, जिसे ज्ञानी प्रेमयोग भी कहते हैं। हम सब आस्थावान ईश्वर के किसी न किसी रूप की पूजा करते ही हैं।
हम में से बहुतेरे अमूमन एक गलती करते ही हैं, जो ईश्वर साक्षात प्रेम स्वरूप है, हम उसी से अपने से छोटों, खासकर बच्चों को डराकर रखते हैं। ऐसा मत करो नहीं तो ईश्वर पाप देंगे, वैसा मत करो नहीं तो ईश्वर दंड देंगे। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि क्या ये कहने से बच्चे ऐसा करना बंद कर देते हैं। नहीं बल्कि इसका उल्टा प्रभाव पड़ता है और वे ईश्वर के समीप जाने की बजाय दूर होने लगते हैं। वे या तो अनिच्छा से पूजा-पाठ करते हैं या उनके मन में समाये डर के कारण। धीरे-धीरे वे अनमने मन से धार्मिक अनुष्ठानों में सम्मिलित होते हैं। उन्हें डर होता है कि कोई गलती हो गई तो, उन्हें पता नहीं क्या दंड मिले। और ऐसे में कोई अनहोनी हो जाये तो, वे अंधविश्वासी होने लगते हैं। ईश्वर का प्रेम जहां उन्हें आत्मविश्वासी बना सकता…

रफ़्तार

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गतांक से आगे...
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दो घंटे बाद
रिपोर्टर- कैसे हुई दुर्घटना
चश्मदीद- भैया हम कई सालों से यहां चाय की दुकान चला रहे हैं, जब से सरकार ने चौड़ी और चिकनी सपाट सड़क बनाई है, आए दिन दुर्घटनाएं हो रही हैं।
आज भी ये लड़के बहुत ज्यादा तेजी से मोटर साइकिल चलाते हुये आ रहे थे और सुना है सबने बहुत शराब भी पी रखी थी। तेज गाड़ी चलाने की होड़ और मस्ती-मज़ाक करते-करते आपस में ही टकरा गए। गाड़ी की रफ़्तार तेज होने के कारण गाड़ी सड़क पर घिसट गई और लड़के खून से लथपथ हो गए, हेलमेट नहीं पहने होने के कारण सबके सिर पर चोट आयी थी और खून काफी ज्यादा बह गया था। जिससे एक दो लड़कों की मौत तो यहीं हो गई थी।
रिपोर्टर- किसी बड़ी गाड़ी ने तो टक्कर नहीं मारी।
चश्मदीद- अरे नहीं-नहीं इतनी चौड़ी सड़क है, आने जाने का अलग-अलग रास्ता, फोरलेन सड़क है। वैसे भी दिन में तो सड़क ज्यादातर खाली ही रहती है,भारी वाहन तो रात में गुजरते हैं।

3 घंटे बाद
रिपोर्टर- सर, सड़क दुर्घटना पर मेरी रिपोर्ट तैयार है।
संपादक- क्या तुम्हारी रिपोर्ट में।
रिपोर्टर- सर, लड़के अपनी गलती से दुर्घटना का शिकार हुए हैं, इसमें किसी की गलती नहीं है। स…

रफ़्तार

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रुको... रुको...
इतनी तेज रफ्तार से मोटर साइकिल चलाना नियम विरुद्ध है,  जुर्माना भरना पड़ेगा, यह कहते हुए ट्रैफिक सिपाही ने रसीद बुक निकाली और तेज गति से आ रहे वाहन चालकों को रोकते हुए कहा।
तभी बाइक पर सवार एक युवक ने लगभग चिल्लाते हुए कहा तू जानता है कौन हूं मैं...साले जुर्माना लगाएगा, तेरी तो रुक अभी बताता हूं।

अरे तुम लोग तो शराब भी पिये हुए हो और किसी ने हेलमेट भी नहीं पहना है, चालान तो बनेगा ही, साथ ही ड्राइविंग लाइसेंस भी निरस्त होगा... ट्रैफिक सिपाही ने कहा।
क्या कहा... तू ड्राइविंग लाइसेंस निरस्त करेगा, रुक अभी बताता हूँ और यह कहते हुए उस नवयुवक ने अपने मोबाइल से किसी को फोन लगा दिया।
5 मिनट के बाद ही सिपाही के मोबाइल फोन की घंटी बजी और फ़ोन पे अधिकारी ने सिपाही को डांटना शुरू कर दिया। अधिकारी की लताड़ से सिपाही का सर झुक गया और वह चुपचाप खड़ा रहा। मोटर साइकिल सवार युवक सिपाही को गाली बकते, अट्टाहास करते हुये तेज रफ्तार से गाड़ी चलाते वहां से चले गए।

1 घंटे बाद
शहर का पूरा प्रशासन, पुलिस और मीडिया वाले सिटी से पांच किलोमीटर दूर हाईवे की ओर भागे जा रहे थे, खबर थी कि नगर सेठ का पुत्…

मनुष्य के दर्शन

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खाली बैठे-बैठे ईश्वर ने सोचा कि चलो धरती का भ्रमण कर अपने बनाये मनुष्य का हालचाल लिया जाए। मनुष्य के आपसी प्रेम और बंधुत्व की भावना को परखा जाए। मनुष्यता और मानवीयता के विषय पर मनुष्य का विकास देखा जाए। धरती पर "मनुष्य" से भेंट की जाए। यही सोचकर धरती पर आए ईश्वर की नज़र एक मंत्री जी पर पड़ी। उन्होंने जान लिया कि मंत्री जी एक सामाजिक कार्यक्रम में जा रहे हैं। ईश्वर ने सोचा कि इसे ही माध्यम बनाया जाए और उन्होंने उसकी काया में प्रवेश कर लिया। समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में पहुंचे मंत्री जी का भव्य स्वागत देखकर ईश्वर को बड़ी खुशी हुई, उन्हें लगा मनुष्य में आपसी प्रेम कितना विकसित हो गया है। तभी नेताजी को पुष्पहारों से लादकर उनकी चरणवंदना देखकर ईश्वर को जल्द ही समझ में आ गया कि इन सारे प्रयोजनों का आशय कुछ और ही है और ईश्वर को ये देखकर बड़ी निराशा हुई।
तभी सामाजिक संगठन के सचिव ने मंत्री जी से कहा... आइये मान्यवर आपका सामाजिक बंधुओं से परिचय करा दूँ... वोट बैंक की मजबूती के लिए मंत्री जी सचिव के साथ चल दिये। सचिव- मान्यवर ये हैं मिस्टर बिल्डर, शहर की अधिकांश गगनचुम्बी इमारतों के …

ज़िन्दगी की किताब के पन्ने

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आँखों में  फिर चमकने लगे हैं  यादों के कुछ लम्हें गूंजने लगी हैं कान में  वो तमाम बातें  जो कभी हमने की ही नहीं  नज़र आई कुछ तस्वीरें  जो वक़्त ने खींच ली होगी  और तुम्हारा ही नाम  पढ़ रहा था हर कहीं  जब पलट रहा था मैं  ज़िन्दगी की किताब के पन्ने

अमरबेल की तरह

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दिल के शज़र की
इक शाख़ पे
इक रोज़
रख दिया था बेचैनी ने
तेरी याद का
इक टुकड़ा
और आज़
दिल के शजर की
कोई शाख़ नहीं दिखती
तेरी याद ने ढ़ाँक लिया है
अमरबेल की तरह
अब वहाँ
दिल नहीं है
सिर्फ तेरी याद है

एहसास की डोलची

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दिल के कमरे में अब
पसर चुकी है वीरानी
ख़्वाबों की अलमारी
कब से पड़ी है खाली
उम्मीदों की तस्वीरों ने
खो दिए हैं रंग अपने
आस की खिड़की भी
अब कभी नहीं खुलती
अश्क़ों की नमी से ऊग आई
एक कोने में यादों की काई
हाँ
ठसाठस भरी है दर्द से एहसास की डोलची




तेरे इंतज़ार की बोझल आँखें शाम ढ़लते-ढ़लते हो जाती है ना-उम्मीद तब तन्हाई के बिछौने पे तेरी यादें ओढ़कर सो जाता हूँ क्योंकि कुछ ख़्वाब इन आँखों की राह तकते हैं चित्र साभार-गूगल

इक तेरे जाने के बाद

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हर शाम ग़मगीं सी
हर सुबह उनींदी सी
हर ख़्याल खोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर वक़्त बिखरा सा
हर अश्क़ दहका सा
एहसास भिगोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर दर्द महका सा
हर वक़्त तन्हा सा
हर ख़्वाब रोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर सांस चुभती सी
हर बात कड़वी सी
हर नाम ढ़ोया सा
इक तेरे जाने के बाद


शब्द बिखर जाते हैं

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अक्सर शब्द बिखर जाते हैं
कोशिश बहुत करता हूँ, कि
शब्दों को समेट कर
कोई कविता लिखूं
पर ये हो नहीं पाता
कोशिश बहुत करता हूँ कि
एहसास समेट कर रखूं
पर ये हो नहीं पाता
तकिये पर बिखरे अश्क़ों की तरह
अक्सर शब्द बिखर जाते हैं

शायद तुम नहीं जानती

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शायद तुम नहीं जानती मैंने रोक रक्खा है पलकों के भीतर आंसुओं के समंदर में  उठने वाले ज्वार को बनाकर यादों का तटबंध कुछ लहरें फिर भी तोड़ देती हैं तटबंध और तन्हाई के साहिल पे छोड़ जाती हैं नमक के किरचे जो चुभ जाते हैं सुकून के पाँव में और सुनाई देती है करीब आते दर्द की आहट कुछ तस्वीरें दर्द की खींच कर वक्त ने टंगा दी हैं दिल की दीवार पे ठोक के एहसास की कीलें जो चुभती हैं हर सांस की जुंबिश पर फिर रो पड़ते हैं ख़्वाब मोहब्बत के और भिगो देते हैं पलकों की कोरों को 🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸




🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸 आँखों की दहलीज़ पे  बैठे कुछ ख़्वाब, कब से राह देख रहे हैं नींद की और नींद भटक रही है यादों के सहरा में सुकून के जुगनुओं का पीछा करते हुए... ज़िद पे अड़ी थी नींद आँखों की तलाशी लेने और मिला क्या कुछ सुबकते हुए ख़्वाब चंद धुंधली सी तश्वीरें एक दरिया अश्कों का जिसमें तैरती अरमानों की लाशें 🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸

सोया हुआ ज्वालामुखी

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हलचल सी मची है
उम्मीदों की बस्ती में
गिरने लगे हैं
तमन्ना के झुलसे हुये शजर 
कुछ ही देर में ढाँक लेगा
अहसास के आसमां को
पिघले हुये ख़्वाबों का
लावा और गुबार
क्योंकि 
आँखों में फूट पड़ा है
वादी-ए-ख़्वाब में
सोया हुआ ज्वालामुखी...
चित्र साभार-गूगल

अधिकार याद रहे कर्तव्य भूल गए

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15 अगस्त को भारत वर्ष में स्वतंत्रता दिवस बड़े ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया जाता है। हर्ष इस बात का कि इस दिन हमें आजादी मिली और धूम इस बात की कि अब हम पूरी स्वतत्रंता से अपनी मनमानी कर सकते हैं। गाहे-बगाहे हम स्वतंत्रता की बात करते हुए अपने अधिकारों के लिये लड़ते हैं। जो मन होता है कह देते हैं और जब हमारे कहे का विरोध होता है तब इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार कहते हुए सही ठहराते हैं। हम अपने अधिकारों के लिये पूरी शक्ति से लड़ते हैं और इसका अतिक्रमण होने पर पुरजोर विरोध भी करते हैं, लेकिन अधिकारों की लड़ाई में हम अपने कर्तव्य भूल जाते हैं। ज्ञात रहे कि हमें संविधान ने 6 मौलिक अधिकार दिए हैं, लेकिन हमारे 11 मूल कर्तव्य भी हैं। ये सही है कि हमें अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए, लेकिन अपने कर्तव्यों को भी नहीं भूलना चाहिये।
संविधान ने हमें जो मौलिक अधिकार दिए गए वो इसलिए ताकि कोई हमारी आज़ादी न छीन सके, हमारा शोषण न कर सके। लेकिन अधिकारों को पाकर हम इतने उन्मुक्त न हों जाएं कि अपने कर्तव्यों को भूल जाएं और इससे हमारे समाज और देश का अपयश हो। हमें संविधान द्वारा मूल रूप से सा…

छांव बेच आया है-क़तआत

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चला शहर को तो वो गांव बेच आया है अजब मुसाफ़िर है जो पांव बेच आया है मकां बना लिया माँ-बाप से अलग उसने शजर ख़रीद लिया छांव बेच आया है - तेरे ही साथ को सांसों का साथ कहता हूँ तुझी को मैं, तुझी को कायनात कहता हूँ तेरी पनाह में गुज़रे जो चंद पल मेरे बस उन्ही लम्हों को सारी हयात कहता हूँ - प्यार की रोशनी से माहताब दिल हुआ तेरी इक निगाह से बेताब दिल हुआ हजार गुल दिल में ख़्वाबों के खिल गए तेरी नज़दीकियों से शादाब दिल हुआ - पल-पल बोझल था, मगर कट गई रात सहर के उजालों में सिमट गई रात डरा रही थी अंधेरे के ज़ोर पर मुझे जला जो दिले-नदीश तो छंट गई रात - - रंग भरूँ शोख़ी में आज शाबाबों का रुख़ पे तेरे मल दूँ अर्क गुलाबों का होंठों का आलिंगन कर यूं, होंठों से हो जाये श्रृंगार हमारे ख़्वाबों का - किनारों से बहुत रूठा हुआ है कलेजा नाव का सहमा हुआ है पटकती सर है, ये बेचैन लहरें समंदर दर्द में डूबा हुआ है - चित्र साभार-गूगल

देश कहाँ है

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इन दिनों देश में एक विचित्र सा वातावरण निर्मित हो गया है। लोगों और समुदायों का आपसी विरोध, देश विरोध तक जा पहुंचा है। इससे न देश में प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि सात समंदर पार भी देश की छवि धूमिल हो रही है।

इन दिनों स्थिति ये है कि एक पक्ष कहे कि स्वेदशी अपनाओं तो दूसरा पक्ष देशी कंपनियों की बुराई आरम्भ कर देता है, वहीं दूसरा पक्ष कहे कि ये गलत है, तो पहला पक्ष उसे सही साबित करने में जुट जाता है और इनके बीच की लड़ाई में देश कहीं खो जाता है। देश प्रथम की भावना और मानसिकता का पूरी तरह लोप हो चुका है। कैसी विडंबना है कि कोई ये नहीं सोचता कि देश बचा रहेगा तो हम बचे रहेंगे।

इन सब में एक तीसरा पक्ष भी है, जो बहुत ही भयावह है। जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तीसरे पक्ष का इतिहास बताता है कि वो दुश्मनों के साथ ही रहा है। इन पक्षों के आपसी विरोध में देश कहीं नहीं होता। होता है तो बस स्वहित, लोभ और शक्ति सम्पन्न बनने की हवस। वर्तमान में व्यक्ति पूजा ने देश और देशहित को कहीं पीछे धकेल दिया है। आज सभी पक्षों में आपसी विरोध इतना हो चुका है कि सब एक दूसरे को नेस्तनाबूद कर देना चाहते है…

औलाद का फर्ज़

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नहीं अब तुम्हें नौकरी नहीं मिल सकती...
ऐसा न कहो सेठ जी नौकरी न रही तो मैं और मेरा परिवार भूखा मर जायेगा...मुन्ना ने गिड़गिगते हुए चमन सेठ से कहा।
चमन सेठ-तो बिना बताए आठ महीने कहाँ चला गया था, इतने दिन पेट कैसे भरा तेरा, अब तुझे नौकरी नहीं मिलेगी मुन्ना, मैंने दूसरा आदमी रख लिया है।
ऐसा न करो सेठ जी, मैं कहाँ जाऊंगा, सालों तक आपके यहां नौकरी की है, अब दूसरा ठिकाना कहाँ ढूँढू, मुन्ना फिर गिड़गिड़ाया।
तुझे पहले ये सब याद नहीं रहा, जो अब ये सब कह रहा है, आखिर गया कहाँ था तू, चमन सेठ ने मुन्ना को डपटते हुए कहा।
गांव चला गया था सेठ जी, पिता जी बीमार थे, उनकी सेवा करते इतने दिन गुजर गए, मुन्ना ने कहा।
चमन सेठ- अरे और कोई नहीं है घर में उनकी सेवा के लिए, जो तू आठ महीने गायब रहा।
मुन्ना-नहीं है सेठ जी, कोई नहीं मेरे सिवा। मेरे माँ-पिता ने अपना फर्ज निभाया और अब मुझे अपना फर्ज निभाना है। पिता की सेवा का अवसर मिला ये तो मेरा सौभाग्य है, ज्यादा दिन उनकी सेवा नहीं कर पाया इसका दुख है। कितने कष्ट सहकर उन्होंने मुझे पाला पोसा था।
चमन सेठ-बस कर, ये तो हर माँ-बाप का फर्ज़ होता है, इसमें नई बात क्या है।

तुम कभी आओ तो

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तुम कभी आओ तो
मैं घुमाऊँ तुमको
खण्डहर सी ज़िन्दगी के
उस कोने में जहाँ
अब भी पड़ीं हैं
अरमानों की अधपकी ईंटें
ख़्वाबों के अधजले टुकड़े
अहसास का बिखरा मलबा
उम्मीद का भुरभुरा गारा
तुम कभी आओ तो
मैं दिखाऊँ तुमको
खुशियों की बेरंग तस्वीरें
अश्कों का लबालब पोखर
धोखों के घने जाले
रिश्तों की चौड़ी दरारें
तुम कभी आओ तो

*रेखाचित्र-अनुप्रिया

पतझड़ के बाद की बहार

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शेष भाग...
अपने कमरे पहुंच के मनु की आँखे नम हो गई। उसके कानों में बार-बार पापा की बात ही गूँज रही थी। उसने जैसे तैसे खुद को सयंत किया। इतने आर्ष का फोन आ गया, लेकिन उसने काट दिया। इधर फोन कटने से आर्ष भी परेशान हो रहा था। उधर विनय मनु और आर्ष के रिश्ते को लेकर परेशान था। उसे सिर्फ दोनों परिवारों के बीच जो बड़ा आर्थिक अंतर था, वो बात परेशान किए जा रही थी। जैसे तैसे ये दिन गुज़र गया। दूसरे दिन उसने महसूस किया कि मनु गुमसुम है, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा, वहीं मनु पूरी कोशिश कर रही थी कि वो सामान्य नज़र आये। इसी तरह कुछ दिन बीत गए। अगले रविवार को आर्ष का फोन विनय के पास आया... हेलो अंकल मैं आर्ष बोल रहा हूँ हाँ कहो आर्ष.. विनय ने सामान्य होते हुए कहा मेरे मम्मी-पापा आपसे मिलना चाहते हैं, आर्ष ने जवाब दिया लेकिन... कुछ कहते हुए विनय रुक गया और फिर कहा ठीक है, कब मिलने आ रहे हो आज शाम ही, आर्ष ने जवाब दिया आज शाम, विनय ने हड़बड़ाते हुए कहा हाँ, आप परेशान न होइए और कुछ तामझाम करने की भी जरूरत नहीं,  हम लोग शाम 7 बजे आएंगे..आर्ष बोला और फोन काट दिया फोन कटने के विनय ने अरु को आवाज़ दी... अरु कहाँ ह…

पतझड़ के बाद की बहार

क्या हुआ इतना परेशान क्यों हो?
अरे कुछ नहीं अरु, वो मेरा दोस्त है न प्रकाश उसकी बेटी ...
क्या हुआ उसको?
अरे हुआ कुछ नहीं, वो किसी लड़के को पसंद करती थी और दो दिन पहले ही उसने घर में किसी को बताए बिना मंदिर में शादी कर ली।
ओह्ह, ये तो बहुत बुरा हुआ, ये आजकल के बच्चे भी न, माँ बाप की बिल्कुल फिक्र नहीं है इनको। ऐसे मामलों में संबंध भी बिगड़ते हैं और घर की इज्ज़त भी जाती रहती है।
हाँ सच कहा लेकिन क्या करें अरु, आजकल के बच्चे पढ़ लिख कर खुद को इतना समझदार समझने लगते हैं, ज़िन्दगी के बड़े फैसलों में भी माँ-बाप से सलाह नहीं लेते।
हाँ सच कहा विनय तुमने।
अरे अब तुम क्यों उदास हो, विनय ने अरु से पूछा
हमारी भी बेटी है, पता नहीं क्या होगा बड़ा खराब समय चल रहा है। मुझे तो बहुत चिंता हो रही है, सुनो मनु की पढ़ाई पूरी होते ही उसकी शादी कर देंगे। हाँ अभी से अच्छा सा लड़का देखना शुरू कर दो।
अरे तुम तो बेकार परेशान हो रही हो, विनय ने अरु का हाथ पकड़ते हुए कहा। ज्यादा सोचना सेहत के लिए खराब है,  वैसे हमारी मनु बहुत समझदार है, अच्छा अब मेरे लिए एक कप चाय बना दो।
अरु के जाते ही विनय भी सोचने लगा, आखिर अरु ठीक ही …

आशाओं के दीप जलायें

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निराशाओं के घोर तमस में आशाओं के दीप जलायें
भावनाओं से उसे सींच कर अपनेपन का पेड़ लगायें

अभिनंदित हो जहाँ भावना और प्यार से जग सुरभित हो
राग-द्वेष से रहित हृदय में कोमलता ही स्पंदित हो
दुनिया के हर छद्म भूलकर सबको अपना मीत बनायें
आँखों में आकाश बसा हो और प्रकाशित हों सब राहें
सबको अपने गले लगाने प्रस्तुत हो हरदम ये बांहें
जो अपनी गलती पर टोके, उसको अपने पास बिठायें

अपना हो या कोई पराया, प्रेम सदा बातों में छलके
अपनी खामी पर हँस लें हम, ग़ैर के ग़म में आंसू ढलके
आओ मिलकर यही बात हम, सारी दुनिया को समझायें
*रेखचित्र-अनुप्रिया

पर्यावरण दिवस

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आज सारी दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस मना रही है, अच्छी बात है मनाना भी चाहिए, लेकिन क्या पर्यावरण की फिक्र करने के लिए सिर्फ 24 घंटे काफी हैं। आप सब भी समझते हैं कि नहीं है, हमें अपनी हर सांस के साथ पर्यावरण की चिंता होनी चाहिए, क्योंकि हम सांसों के माध्यम से जो आक्सीजन अपने शरीर में भर रहे हैं, वो पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमें पानी पीते समय पर्यावरण की चिंता करनी चाहिए, क्योंकि हम जो पानी पी रहे हैं वो भी पर्यावरण का हिस्सा है। हमें सुंदर प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते समय पर्यावरण की चिंता करनी चाहिए, क्योंकि ये सब भी पर्यावरण का हिस्सा है, यानि की हमें हर पल पर्यावरण की चिंता करनी चाहिए। 
पर्यावरण यानि पर्या जो हमारे चारों ओर है और आवरण जो हमें चारों ओर से घेरे हुये है। इसका सीधा मतलब है कि हम जिस आवरण से जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत तक घिरे रहते हैं और इसका प्रत्येक अंश हमारे लिए जीवनोपयोगी है, फिर भी हम उसे नुकसान पहुंचाने में जरा भी संकोच नहीं करते। हम ये तो नहीं सोचते कि हम प्रकृति के जिन अंशों को क्षति पहुंचा रहे हैं, उनके न होने पर हमारी मृत्यु निश्चित है, लेकिन क्या करे…

तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश

कई दिन से चुप तेरी यादों के पंछी
फिर सहन-ए-दिल में चहकने लगे हैं ख़्वाबों के मौसम भी आकर हमारी आँखों मे फिर से महकने लगे हैं
उमंगों की सूखी नदी के किनारे आशाओं की नाव टूटी पड़ी है तपती हुई रेत में ज़िन्दगी की हमारी उम्मीदों की बस्ती खड़ी है ज़मीं देखकर दिल की तपती हुई ये अश्क़ों के बादल बरसने लगे हैं
हर एक शाम तन्हाइयों में हमारी मौसम तुम्हारी ही यादें जगाये तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश मुहब्बत का मुरझाया गुलशन सजाये पाकर के अपने ख्यालों में तुमको अरमान दिल के मचलने लगे हैं
ज़ेहन में तो बस तुम ही तुम हो हमारे मगर दिल को अब तुमसे निस्बत नहीं है तुम्हें चाहते हैं बहुत अब भी लेकिन है सच अब तुम्हारी जरूरत नहीं है भुला दें तुम्हें या न भूलें तुम्हें हम खुद से ही खुद अब उलझने लगे हैं

आँखों का पानी लिखता हूँ

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शब्दों की ज़ुबानी लिखता हूँ
गीतों की कहानी लिखता हूँ
दर्दों के विस्तृत अम्बर में भावों के पंक्षी उड़ते हैं नाचें हैं शरारे उल्फ़त के जब तार ह्रदय के जुड़ते हैं हर सुबह से शबनम लेकर फिर शाम सुहानी लिखता हूँ
जब दर्द से जुड़ता है रिश्ता हर बात प्रीत से होती है तब भावनाओं के धागे में अश्क़ों को आँख पिरोती है ऐसे ही अपनेपन को मैं रिश्तों की निशानी लिखता हूँ पानी में आँखों के भीतर ये नमक ग़मों का घुलता है जब नेह की होती है बारिश तब मैल ह्रदय का धुलता है दरिया से निर्मल जल सा मैं आँखों का पानी लिखता हूँ 
*रेखाचित्र-अनुप्रिया

अनुरागों का किल्लोल कहाँ

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ये सहज प्रेम से विमुख ह्रदय क्यों अपनी गरिमा खोते हैं समझौतों पर आधारित जो वो रिश्ते भार ही होते हैं
क्षण-भंगुर से इस जीवन सा हम आओ हर पल को जी लें जो मिले घृणा से, अमृत त्यागें और प्रेम का विष पी लें स्वीकारें वो ही उत्प्रेरण, जो बीज अमन के बोते हैं
आशाओं का दामन थामे हर दुःख का मरुथल पार करें इस व्यथित हक़ीकत की दुनिया में  सपनो को साकार करें सुबह गए पंक्षी खा-पीकर, जो शाम हुई घर लौटे हैं
जो ह्रदय, हीन है भावों से उसमें निष्ठा का मोल कहाँ उसके मानस की नदिया में अनुरागों का किल्लोल कहाँ है जीवित, जो दूजे दुख में अपने एहसास भिगोते हैं  *रेखाचित्र-अनुप्रिया

संवरती रही ग़ज़ल

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ख़्वाबे-वफ़ा के ज़िस्म की खराश देखकर
इन आँसुओं की बिखरी हुई लाश देखकर
जब से चला हूँ मैं कहीं ठहरा न एक पल
राहें भी रो पड़ीं मेरी तलाश देखकर
.
आँख से चेहरा तेरा जाता नहीं कभी
दिल भूल के भी भूलने पाता नहीं कभी
हो धूप ग़म की या कि हो अश्क़ों की बारिशें
फूल तेरी यादों का मुरझाता नहीं कभी
.
जो आँखों से आंसू झरे, देख लेते नज़र इक मुझे भी  अरे, देख लेते
हुए गुम क्यूँ आभासी रंगीनियों में
मुहब्बत,  बदन  से  परे, देख लेते
.
जब भी मेरे ज़ेह्न में संवरती रही ग़ज़ल 
तेरे ही ख़्यालों से महकती रही ग़ज़ल
झरते रहे हैं अश्क़ भी आँखों से दर्द की 
और उँगलियां एहसास की लिखती रही ग़ज़ल
.
ख़िल्वत की पोशीदा पीर भेजी है तुमको ख़्वाबों की ताबीर भेजी है
रंग मुहब्बत का थोड़ा सा भर देना
यादों की बेरंग कुछ तस्वीर भेजी है
.
उदास-उदास सा है ज़िन्दगी का मौसम
नहीं आया हुई मुद्दत खुशी का मौसम
दिल कॊ बेचैन किये रहता है नदीश सदा
याद रह जाता है कभी-कभी का मौसम . सांसों की फिसलती हुई ये डोर थामकर
बेताब दिल की घड़कनों का शोर थामकर
करता हूँ इंतज़ार इसी आस में कि तुम
आओगी कभी तीरगी में भोर थामकर
.
लब पे लबों की छुअन का एहसास रहने दो
बस एक पल तो खुद को , मेरे पास र…

दर्द कोई बोलता हुआ

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ये तेरी जुस्तजू से मुझे तज़ुर्बा हुआ
मंज़िल हुई मेरी न मेरा रास्ता हुआ

खुशियों को कहीं भी न कभी रास आऊँ मैं
हाँ सल्तनत में दर्द की ये फैसला हुआ

मिट ना सकेगा ये किसी सूरत भी अब कभी
नज़दीकियों के दरम्यान जो फासला हुआ

जब से खँगालने चले तहखाने नींद के
अश्क़ों की बगावत में ख़्वाब था डरा हुआ

अक्सर ये सोचता हूँ क्या है मेरा वज़ूद
मैं एक अजनबी से बदन में पड़ा हुआ

थी ज़िंदगी की कश्मकश कि होश गुम गए
कहते हैं लोग उसको कि वो सिरफिरा हुआ

है मेरा अपना हौसला परवाज़ भी मेरी
मैं एक परिन्दा हूँ मगर पर कटा हुआ

मजबूरियों ने मेरी न छोड़ा मुझे कहीं
मत पूछना ये तुझसे मैं कैसे जुदा हुआ

अब थम गया नदीश तेरी ख़िल्वतों का शोर
हाँ मिल गया है दर्द कोई बोलता हुआ
रेखाचित्र-अनुप्रिया

समय वही क्यों दिखलाता है

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व्याकुल हो जब भी मन मेरा तब-तब गीत नया गाता है आँखों में इक सपन सलोना  चुपके-चुपके आ जाता है
जोड़-जोड़ के तिनका-तिनका  नन्हीं चिड़िया नीड़ बनती मिलकर बेबस-बेकस चीटी इक ताकतवर भीड़ बनती छोटी-छोटी खुशियाँ जी लो यही तो जीवन कहलाता है

जीवन के सारे रंगों से  भीग रहा है मेरा कण-कण मुझे कसौटी पर रखकर ये समय परखता है क्यूँ क्षण-क्षण गड़ता है जो भी आँखों में समय वही क्यों दिखलाता है

जाने किस पल हुआ पराया वो भी तो मेरा अपना था  रिश्ता था कच्चे धागों का मगर टूटना इक सदमा था घातों से चोटिल मेरा मन आज बहुत ही घबराता है
रेखाचित्र-अनुप्रिया