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Showing posts from 2017

लौट गई तन्हाई भी

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दिल की उम्मीदों को सीने में छिपाए रक्खा इन चिरागों को हवाओं से बचाए रक्खा
हमसे मायूस होके लौट गई तन्हाई भी हमने खुद को तेरी यादों में डुबाए रक्खा
तिरे ख़्याल ने दिन-रात मुझे सताया है हुई जो रात तो ख़्वाबों ने जगाए रक्खा
वक़्त ने तो दी सदा मुझको मुसलसल लेकिन मिरी ही धड़कनों ने मुझको भुलाए रक्खा
 उमड़ पड़ा है ये तूफान देखकर तुमको मुद्दतों से जिसे इस दिल में दबाए रक्खा
 रही बिखेरती ख़ुश्बू नदीश की ग़ज़लें एक-एक हर्फ़ ने एहसास बनाए रक्खा चित्र साभार-गूगल

ख्वाब की तरह से

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ख्वाब की तरह से आँखों में छिपाए रखना हमको दुनिया की निगाहों से बचाए रखना
बिखर न जाऊं कहीं टूटकर आंसू की तरह मेरे वजूद को पलकों पे उठाए रखना
आज है ग़म तो यक़ीनन ख़ुशी भी आएगी दिल में एक शम्मा तो उम्मीदों की जलाए रखना
तल्ख़ एहसास से महफूज़ रखेगी तुझको मेरी तस्वीर को सीने से लगाए रखना
ग़ज़ल नहीं, है ये आइना-ए-हयात मेरी अक्स जब भी देखना एहसास जगाए रखना
ग़मों के साथ मोहब्बत है ये आसान नदीश ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाए रखना
रेखाचित्र-अनुप्रिया

चाँदनी की तरह

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प्यार हमने किया ज़िन्दगी की तरह
आप हरदम मिले अजनबी की तरह

मैं भी इंसां हूँ, इंसान हैं आप भी
फिर मिलते क्यों नहीं आदमी की तरह

मेरे सीने में भी इक धड़कता है दिल
प्यार यूँ न करें दिल्लगी की तरह

दोस्त बन के निभाई है जिनसे वफ़ा
दोस्ती कर रहे हैं दुश्मनी की तरह

हमको कोई गिला ग़म से होता नहीं
गर ख़ुशी कोई मिलती ख़ुशी की तरह


आज फिर से मेरे दिल ने पाया सुकूं
सोचकर आपको शायरी की तरह

ग़म की राहों में जब भी अंधेरे बढ़े
अश्क़ बिखरे सदा चाँदनी की तरह

काश दिल को तुम्हारे ये आता समझ
इश्क़ मेरा नहीं हर किसी की तरह

याद आई है जब भी तुम्हारी नदीश
तीरगी में हुई रोशनी की तरह


चित्र साभार-गूगल

फेफड़ों को खुली हवा न मिली

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फेफड़ों को खुली हवा न मिली
न मिली आपसे वफ़ा न मिली

दुश्मनी ढूँढ़-ढूंढ़ कर हारी
दोस्ती है जो लापता न मिली

वक़्त पे छोड़ दिया है सब कुछ
दर्दे-दिल की कोई दवा न मिली

हर किसी हाथ में मिला खंज़र
आपकी बात भी जुदा न मिली

है न हैरत, जहां में कोई भी
खुशी, ग़मों से आशना न मिली

सोचता है नदीश ये अक्सर
ज़िन्दगी आपके बिना न मिली



चित्र साभार-गूगल

मिला जो शख़्स

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बिछड़ते वक़्त तेरे अश्क़ का हर इक क़तरा लिपट के रास्ते से मेरे तरबतर निकला
खुशी से दर्द की आँखों में आ गए आंसू मिला जो शख़्स वो ख़्वाबों का हमसफ़र निकला
रोज दाने बिखेरता है जो परिंदों को उसके तहख़ाने से कटा हुआ शजर निकला
हर घड़ी साथ ही रहा है वो नदीश मेरे दर्द का एक पल जो खुशियों से बेहतर निकला

ज़िन्दगी की किताब के पन्ने

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आँखों में  फिर चमकने लगे हैं  यादों के कुछ लम्हें गूंजने लगी हैं कान में  वो तमाम बातें  जो कभी हमने की ही नहीं  नज़र आई कुछ तस्वीरें  जो वक़्त ने खींच ली होगी  और तुम्हारा ही नाम  पढ़ रहा था हर कहीं  जब पलट रहा था मैं  ज़िन्दगी की किताब के पन्ने

अमरबेल की तरह

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दिल के शज़र की
इक शाख़ पे
इक रोज़
रख दिया था बेचैनी ने
तेरी याद का
इक टुकड़ा
और आज़
दिल के शजर की
कोई शाख़ नहीं दिखती
तेरी याद ने ढ़ाँक लिया है
अमरबेल की तरह
अब वहाँ
दिल नहीं है
सिर्फ तेरी याद है

एहसास की डोलची

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दिल के कमरे में अब
पसर चुकी है वीरानी
ख़्वाबों की अलमारी
कब से पड़ी है खाली
उम्मीदों की तस्वीरों ने
खो दिए हैं रंग अपने
आस की खिड़की भी
अब कभी नहीं खुलती
अश्क़ों की नमी से ऊग आई
एक कोने में यादों की काई
हाँ
ठसाठस भरी है दर्द से एहसास की डोलची

तेरे इंतज़ार की बोझल आँखें शाम ढ़लते-ढ़लते हो जाती है ना-उम्मीद तब तन्हाई के बिछौने पे तेरी यादें ओढ़कर सो जाता हूँ क्योंकि कुछ ख़्वाब इन आँखों की राह तकते हैं रेखाचित्र-अनुप्रिया

इक तेरे जाने के बाद

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हर शाम ग़मगीं सी
हर सुबह उनींदी सी
हर ख़्याल खोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर वक़्त बिखरा सा
हर अश्क़ दहका सा
एहसास भिगोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर दर्द महका सा
हर वक़्त तन्हा सा
हर ख़्वाब रोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर सांस चुभती सी
हर बात कड़वी सी
हर नाम ढ़ोया सा
इक तेरे जाने के बाद


शब्द बिखर जाते हैं

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अक्सर शब्द बिखर जाते हैं
कोशिश बहुत करता हूँ, कि
शब्दों को समेट कर
कोई कविता लिखूं
पर ये हो नहीं पाता
कोशिश बहुत करता हूँ कि
एहसास समेट कर रखूं
पर ये हो नहीं पाता
तकिये पर बिखरे अश्क़ों की तरह
अक्सर शब्द बिखर जाते हैं

शायद तुम नहीं जानती

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शायद तुम नहीं जानती मैंने रोक रक्खा है पलकों के भीतर आंसुओं के समंदर में  उठने वाले ज्वार को बनाकर यादों का तटबंध कुछ लहरें फिर भी तोड़ देती हैं तटबंध और तन्हाई के साहिल पे छोड़ जाती हैं नमक के किरचे जो चुभ जाते हैं सुकून के पाँव में और सुनाई देती है करीब आते दर्द की आहट कुछ तस्वीरें दर्द की खींच कर वक्त ने टंगा दी हैं दिल की दीवार पे ठोक के एहसास की कीलें जो चुभती हैं हर सांस की जुंबिश पर फिर रो पड़ते हैं ख़्वाब मोहब्बत के और भिगो देते हैं पलकों की कोरों को 🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸




🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸 आँखों की दहलीज़ पे  बैठे कुछ ख़्वाब, कब से राह देख रहे हैं नींद की और नींद भटक रही है यादों के सहरा में सुकून के जुगनुओं का पीछा करते हुए... ज़िद पे अड़ी थी नींद आँखों की तलाशी लेने और मिला क्या कुछ सुबकते हुए ख़्वाब चंद धुंधली सी तश्वीरें एक दरिया अश्कों का जिसमें तैरती अरमानों की लाशें 🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸

ज़िन्दगी मुस्कुरा दी

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साँसों ने चाहा ओ' दिल ने दुआ दी मिला साथ तेरा ज़िन्दगी मुस्कुरा दी
सोचा था भुलाऊंगा यादों को तेरी मगर याद ने सारी दुनिया भुला दी
ग़ज़ब कर दिया मेरे एहसास ने भी मुहब्बत को तन्हाइयों की सज़ा दी
वही कह रहे हैं मुझे बेवफ़ा अब जिन्हें तोहफ़े में हम ही ने वफ़ा दी
उसकी आरज़ू में नदीश हमने अपनी उम्र ये सारी तन्हा तन्हा बिता दी

सौग़ात हो गई

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पल भर तुमसे बात हो गई
ख़ुशियों की सौग़ात हो गई

दुश्मन है इन्सां का इन्सां
कैसी उसकी जात हो गई

आँखों में है एक कहकशां
अश्कों की बारात हो गई

वक़्त, वक़्त ने दिया ही नहीं
बातें  अकस्मात  हो  गई

जख़्म मिले ता-उम्र जो नदीश
रिश्तों  की  सौग़ात  हो गई


चित्र साभार-गूगल

सोया हुआ ज्वालामुखी

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हलचल सी मची है
उम्मीदों की बस्ती में
गिरने लगे हैं
तमन्ना के झुलसे हुये शजर 
कुछ ही देर में ढाँक लेगा
अहसास के आसमां को
पिघले हुये ख़्वाबों का
लावा और गुबार
क्योंकि 
आँखों में फूट पड़ा है
वादी-ए-ख़्वाब में
सोया हुआ ज्वालामुखी...
चित्र साभार-गूगल

न सोई आँखें

ख़्वाब जिसके तमाम उम्र संजोई आँखें
उसकी यादों ने आंसुओं से भिगोई आँखें

तेरे ख़्वाबों की हर एक वादा खिलाफी की कसम
मुद्दतें हो गई है फिर भी न सोई आँखें

जिक्र छेड़ो न अभी यार तुम जमाने का
हुस्न के ख़्वाबों-ख्यालों में है खोई आँखें

फूल में याद के बिखरी हुई है शबनम सी
रात भर यूँ लगे है जैसे कि रोई आँखें

हाले-दिल कह न सके हम भी और नदीश यहाँ
मेरी आँखों को भी न पढ़ सकी कोई आँखें

लम्हा-ए-विसाल था

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शबे-वस्ल तेरी हया का कमाल था  सुबह देखा तो आसमां भी लाल था 
 कटे हैं यूँ हर पल ज़िन्दगी के अपने  नफ़स नफ़स में वो कितना बवाल था  
जवाब देते अहले-जहां को, तो क्या  तुझी से बावस्ता हर एक सवाल था 
 चमकता है जो मेरी आँखों में अब भी  वो रूहानी पल जो लम्हा-ए-विसाल था 
 कटे ज़िन्दगी इस तरह कि कहें सब  नदीश सच में जैसा भी था बस कमाल था

चित्र साभार-गूगल

प्यार आपका मिले

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गुलों की राह के कांटे सभी खफ़ा मिले मुहब्बत में वफ़ा की ऐसी न सज़ा मिले
अश्क़ तो उसकी यादों के क़रीब होते हैं तिश्नगी ले चल जहाँ कोई मैक़दा मिले
कहूँ कैसे मैं कि इस शहर-ए-वफ़ा में मुझको जितने भी मिले लोग सभी बेवफ़ा मिले
राह में रौशनी की, थे सभी हमराह मेरे अँधेरे बढ़ गए तो साये लापता मिले
आओ तन्हाई में दो-चार बात तो कर लो महफ़िल में तुम हमें मिले तो क्या मिले
क्या यही हासिल-ए-वफ़ा है, परेशान हूँ मैं कुछ तो आंसू, ख़लिश ओ दर्द के सिवा मिले
आप पे हो किसी का हक़ तो वो नदीश का हो और मुझको ही फ़क़त प्यार आपका मिले चित्र साभार- गूगल

अधिकार याद रहे कर्तव्य भूल गए

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15 अगस्त को भारत वर्ष में स्वतंत्रता दिवस बड़े ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया जाता है। हर्ष इस बात का कि इस दिन हमें आजादी मिली और धूम इस बात की कि अब हम पूरी स्वतत्रंता से अपनी मनमानी कर सकते हैं। गाहे-बगाहे हम स्वतंत्रता की बात करते हुए अपने अधिकारों के लिये लड़ते हैं। जो मन होता है कह देते हैं और जब हमारे कहे का विरोध होता है तब इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार कहते हुए सही ठहराते हैं। हम अपने अधिकारों के लिये पूरी शक्ति से लड़ते हैं और इसका अतिक्रमण होने पर पुरजोर विरोध भी करते हैं, लेकिन अधिकारों की लड़ाई में हम अपने कर्तव्य भूल जाते हैं। ज्ञात रहे कि हमें संविधान ने 6 मौलिक अधिकार दिए हैं, लेकिन हमारे 11 मूल कर्तव्य भी हैं। ये सही है कि हमें अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए, लेकिन अपने कर्तव्यों को भी नहीं भूलना चाहिये।
संविधान ने हमें जो मौलिक अधिकार दिए गए वो इसलिए ताकि कोई हमारी आज़ादी न छीन सके, हमारा शोषण न कर सके। लेकिन अधिकारों को पाकर हम इतने उन्मुक्त न हों जाएं कि अपने कर्तव्यों को भूल जाएं और इससे हमारे समाज और देश का अपयश हो। हमें संविधान द्वारा मूल रूप से सा…

महके है तेरी याद से

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तूफ़ान में   कश्ती  को उतारा नहीं होता उल्फ़त का अगर तेरी किनारा नहीं होता
ये सोचता हूँ, कैसे गुजरती ये ज़िन्दगी दर्दों का जो है, गर वो सहारा नहीं होता
मेरी किसी भी रात की आती नहीं सुबह ख़्वाबों को अगर तुमने संवारा नहीं होता
बढ़ती न अगर प्यास ये, आँखों की इस कदर अश्क़ों को ढलकने का इशारा नहीं होता
महरूम हुए लोग वो लज्ज़त से दर्द की जिनको भी दर्द-ए-ग़ैर गवारा नहीं होता
उभरे है अक़्स तेरा ख़्यालों में जब मेरे आँखों में  कोई  और नज़ारा  नहीं होता
महके है तेरी याद से वो पल बहुत नदीश जो  साथ तेरे  हमने  गुजारा  नहीं  होता
चित्र साभार-गूगल

जिंदगी की तरह

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प्यार हमने किया जिंदगी की तरह
आप हरदम मिले अजनबी की तरह

मैं भी इन्सां हूँ, इन्सान हैं आप भी
फिर क्यों मिलते नहीं आदमी की तरह

मेरे सीने में भी इक धड़कता है दिल
प्यार यूँ न करें दिल्लगी की तरह

दोस्त बन के निभाई है जिनसे वफ़ा
दोस्ती कर रहे हैं दुश्मनी की तरह
हमको कोई गिला ग़म से होता नहीं
ग़र ख़ुशी कोई मिलती ख़ुशी की तरह

आज फिर से मेरे दिल ने पाया सुकूं
सोचकर आपको शायरी की तरह

ग़म की राहों में जब भी अँधेरे बढ़े
अश्क़ बिखरे सदा चांदनी की तरह

काश दिल को तुम्हारे ये आता समझ
इश्क़ मेरा नहीं हर किसी की तरह

याद आई है जब भी तुम्हारी नदीश
तीरगी में हुई रौशनी की तरह

चित्र साभार-गूगल

मौसम दिखाई देता है

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कितना ग़मगीन ये आलम दिखाई देता है हर जगह दर्द का मौसम दिखाई देता है
दिल को आदत सी हो गई है ख़लिश की जैसे अब तो हर खार भी मरहम दिखाई देता है
तमाम रात रो रहा था चाँद भी तन्हा ज़मीं का पैरहन ये नम दिखाई देता है
न आ सका तुझे अश्क़ों को छिपाना अब तक हँसी के साथ-साथ ग़म दिखाई देता है
जहाँ पे दर्द ने जोड़े नहीं कभी रिश्ते वहाँ का जश्न भी मातम दिखाई देता है
ग़मों की दास्तां किस को सुनाता मैं नदीश न हमनवां है न हमदम दिखाई देता है
चित्र साभार- गूगल

कहकशां बनाते हैं

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पोशीदा बातों को सुर्खियां बनाते हैं लोग कैसी-कैसी ये कहानियां बनाते हैं
जिनमें मेरे ख़्वाबों का नूर जगमगाता है वो मेरे आंसू इक कहकशां बनाते हैं

फासला नहीं रक्खा जब बनाने वाले ने क्यों ये दूरियां फिर हम दरम्यां बनाते हैं
फूल उनकी बातों से किस तरह झरे बोलो जो सहन में कांटों से गुलसितां बनाते हैं
.

जब नदीश जलाती है धूप इस ज़माने की हम तुम्हारी यादों से सायबां बनाते हैं
चित्र साभार- गूगल

छांव बेच आया है-क़तआत

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चला शहर को तो वो गांव बेच आया है अजब मुसाफ़िर है जो पांव बेच आया है मकां बना लिया माँ-बाप से अलग उसने शजर ख़रीद लिया छांव बेच आया है - तेरे ही साथ को सांसों का साथ कहता हूँ तुझी को मैं, तुझी को कायनात कहता हूँ तेरी पनाह में गुज़रे जो चंद पल मेरे बस उन्ही लम्हों को सारी हयात कहता हूँ - प्यार की रोशनी से माहताब दिल हुआ तेरी इक निगाह से बेताब दिल हुआ हजार गुल दिल में ख़्वाबों के खिल गए तेरी नज़दीकियों से शादाब दिल हुआ - पल-पल बोझल था, मगर कट गई रात सहर के उजालों में सिमट गई रात डरा रही थी अंधेरे के ज़ोर पर मुझे जला जो दिले-नदीश तो छंट गई रात - - रंग भरूँ शोख़ी में आज शाबाबों का रुख़ पे तेरे मल दूँ अर्क गुलाबों का होंठों का आलिंगन कर यूं, होंठों से हो जाये श्रृंगार हमारे ख़्वाबों का - किनारों से बहुत रूठा हुआ है कलेजा नाव का सहमा हुआ है पटकती सर है, ये बेचैन लहरें समंदर दर्द में डूबा हुआ है - चित्र साभार-गूगल

जुगनू से बिखर जाते हैं

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जब भी यादों में सितमगर की उतर जाते हैं  काफ़िले दर्द के इस दिल से गुज़र जाते हैं
तुम्हारे नाम की हर शै है अमानत मेरी  अश्क़ पलकों में ही आकर के ठहर जाते हैं
किसी भी काम के नहीं ये आईने अब तो अक्स आँखों में देखकर ही संवर जाते हैं
इस कदर तंग है तन्हाईयाँ भी यादों से रास्ते भीड़ के तनहा मुझे कर जाते हैं
देखकर तीरगी बस्ती में उम्मीदों की मिरे अश्क़ ये टूटकर जुगनू से बिखर जाते हैं
बसा लिया है दिल में दर्द को धड़कन की तरह ज़ख्म, ये वक़्त गुजरता है तो भर जाते हैं
खिज़ां को क्या कभी ये अफ़सोस हुआ होगा उसके आने से ये पत्ते क्यों झर जाते हैं
बुझा के रहते हैं दिये जो उम्मीदों के नदीश रह-ए-हयात में होते हुए मर जाते हैं 
चित्र साभार- गूगल

वफ़ा की आँच

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जलते हैं दिल के ज़ख्म ये पाके दवा की आँच
होंठों को है जलाती मेरे अब दुआ की आँच 
अश्क़ों के शरारे समेट कर तमाम रोज
ख़्वाबों को जगाये है मेरे क्यूं मिज़ा की आंच
सोचा था ख्यालों से मिलेगा तेरे सुकून 
लेकर गयी क़रार ये राहत-फ़ज़ा की आँच 

सौदागरी नहीं है, ये है ज़िंदगी मेरी  रखिये अलग ही इससे नुक्सानो-नफ़ा की आँच 

महफूज़ कहाँ रक्खूँ ये जज़्बात दिल के मैं  लगती है हर तरफ ही यहाँ तो ज़फ़ा की आँच 

दरिया ये कोई आग का आई है करके पार पिघला रही है मुझको ये ठंडी हवा की आँच 

क्या हो गया है अब तेरे वादों की धूप को इसमें बची नहीं है ज़रा भी वफ़ा की आँच

लेके नदीश अपने साथ बर्फ़-ए-दर्द चल 
झुलसा ही दे न तुझको ये तेरी अना की आँच

*चित्र साभार- गूगल

बेकल बेबस तन्हा मौसम

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बिखरी शाम सिसकता मौसम बेकल बेबस तन्हा मौसम
तन्हाई को समझ रहा है लेकर चाँद खिसकता मौसम
शब के आंसू चुनने आया लेकर धूप सुनहरा मौसम
चाँद चौदहवीं का हो छत पर फिर देखो मचलता मौसम
जुल्फ चांदनी की बिखराकर बनकर रात महकता मौसम
खिलती कलियों की संगत में फूलों सा ये खिलता मौसम
तेरी यादों की बूंदों से ठंडा हुआ दहकता मौसम
धूप-छांव बनकर नदीश की ग़ज़लों में है ढलता मौसम

देश कहाँ है

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इन दिनों देश में एक विचित्र सा वातावरण निर्मित हो गया है। लोगों और समुदायों का आपसी विरोध, देश विरोध तक जा पहुंचा है। इससे न देश में प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि सात समंदर पार भी देश की छवि धूमिल हो रही है।

इन दिनों स्थिति ये है कि एक पक्ष कहे कि स्वेदशी अपनाओं तो दूसरा पक्ष देशी कंपनियों की बुराई आरम्भ कर देता है, वहीं दूसरा पक्ष कहे कि ये गलत है, तो पहला पक्ष उसे सही साबित करने में जुट जाता है और इनके बीच की लड़ाई में देश कहीं खो जाता है। देश प्रथम की भावना और मानसिकता का पूरी तरह लोप हो चुका है। कैसी विडंबना है कि कोई ये नहीं सोचता कि देश बचा रहेगा तो हम बचे रहेंगे।

इन सब में एक तीसरा पक्ष भी है, जो बहुत ही भयावह है। जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तीसरे पक्ष का इतिहास बताता है कि वो दुश्मनों के साथ ही रहा है। इन पक्षों के आपसी विरोध में देश कहीं नहीं होता। होता है तो बस स्वहित, लोभ और शक्ति सम्पन्न बनने की हवस। वर्तमान में व्यक्ति पूजा ने देश और देशहित को कहीं पीछे धकेल दिया है। आज सभी पक्षों में आपसी विरोध इतना हो चुका है कि सब एक दूसरे को नेस्तनाबूद कर देना चाहते है…

जो भी ख़लिश थी दिल में

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जो भी ख़लिश थी दिल में एहसास हो गयी है दर्द निस्बत मुझे कुछ खास हो गयी है
वजूद हर ख़ुशी का ग़म से है इस जहाँ में फिर जिंदगी क्यूँ इतनी उदास हो गयी है
चराग़ जल रहा है यूँ मेरी मोहब्बत का दिल है दीया, तमन्ना कपास हो गयी है
शिकवा नहीं है कोई अब उनसे बेरूखी का यादों में मोहब्बत की अरदास हो गयी है
नदीश मोहब्बत में वो वक़्त आ गया है तस्कीन प्यास की भी अब प्यास हो गयी है
*चित्र साभार- गूगल

सीने से लगाये रखना

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ख़्वाब की तरह से आँखों में छिपाये रखना
हमको दुनिया की निगाहों से बचाये रखना

बिखर न जाऊँ कहीं टूट के आंसू की तरह
मेरे  वजूद  को  पलकों  पे  उठाये  रखना

आज है ग़म तो यक़ीनन ख़ुशी भी आएगी
दिल में इक शम्मा तो उम्मीदों की जलाये रखना

तल्ख़  एहसास से  महफ़ूज रखेगी तुझको
मेरी  तस्वीर  को  सीने  से  लगाये  रखना

ग़ज़ल  नहीं, है  ये  आइना-ए- हयात  मेरी
अक़्स जब भी देखना एहसास जगाये रखना

ग़मों के  साथ मोहब्बत, है  ये आसान नदीश
ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाये रखना



*चित्र साभार-गूगल


आदमी से आदमी

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रखता नहीं है निस्बतें किसी से आदमी रिश्तों को ढ़ो रहा है आजिज़ी से आदमी
धोखा फ़रेब खून-ए-वफ़ा रस्म हो गए डरने लगा है अब तो दोस्ती से आदमी
मिलती नहीं हवा भी चराग़ों से इस तरह मिलता है जिस तरह से आदमी से आदमी

शिकवा ग़मों का यूँ तो हर एक पल से है यहाँ ख़ुश भी नहीं हुआ मगर ख़ुशी से आदमी
अच्छा है कि  नदीश मुकम्मल नहीं है तू पता है कुछ नया किसी कमी से आदमी

*चित्र साभार-अनुप्रिया

मौसम है दिल में

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वीरानियों का वो आलम है दिल में
मर्ग़-ए-तमन्ना का मातम है दिल में

ठहरा हुआ है अश्कों का बादल
सदियों से बस एक मौसम है दिल में



धुंधला रही है तस्वीर-ए-ख़्वाहिश
उम्मीदों का हर सफ़ह नम है दिल में

मुझको पुकारा है तूने यक़ीनन
ये दर्द शायद तभी कम है दिल में

हंसकर हंसी ने, हंसी में ये पूछा
बताओ नदीश क्या कोई ग़म है दिल में

मार देते हैं

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लड़कपन को भी, जो दिल में है अक्सर मार देते हैं
मेरे ख़्वाबों को सच्चाई के मंज़र मार देते हैं

वफ़ाएं अपनी राह-ए-इश्क़ में जब भी रखी हमने
हिक़ारत से ज़माने वाले ठोकर मार देते हैं

नहीं गैरों की कोई फ़िक्र मैं अपनों से सहमा हूँ
बचाकर आँख जो पीछे से खंज़र मार देते हैं

कभी जब सांस लेती है मेरे एहसास की तितली
यहाँ के लोग तो फूलों को पत्थर मार देते हैं

कहाँ मारोगे कितने मारोगे तलवार से बोलो
सुना है लफ्ज़ से ही लोग लश्कर मार देते हैं
ये लहरों के कबीले ज़ुस्तज़ू में किसकी पागल हैं
पलट कर बारहा साहिल पे जो सर मार देते हैं

कभी तो खोदकर देखो नदीश ज़िस्म की तुरबत
मिलेंगी ख्वाहिशें हम जिनको अंदर मार देते हैं

*चित्र साभार-गूगल

औलाद का फर्ज़

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नहीं अब तुम्हें नौकरी नहीं मिल सकती...
ऐसा न कहो सेठ जी नौकरी न रही तो मैं और मेरा परिवार भूखा मर जायेगा...मुन्ना ने गिड़गिगते हुए चमन सेठ से कहा।
चमन सेठ-तो बिना बताए आठ महीने कहाँ चला गया था, इतने दिन पेट कैसे भरा तेरा, अब तुझे नौकरी नहीं मिलेगी मुन्ना, मैंने दूसरा आदमी रख लिया है।
ऐसा न करो सेठ जी, मैं कहाँ जाऊंगा, सालों तक आपके यहां नौकरी की है, अब दूसरा ठिकाना कहाँ ढूँढू, मुन्ना फिर गिड़गिड़ाया।
तुझे पहले ये सब याद नहीं रहा, जो अब ये सब कह रहा है, आखिर गया कहाँ था तू, चमन सेठ ने मुन्ना को डपटते हुए कहा।
गांव चला गया था सेठ जी, पिता जी बीमार थे, उनकी सेवा करते इतने दिन गुजर गए, मुन्ना ने कहा।
चमन सेठ- अरे और कोई नहीं है घर में उनकी सेवा के लिए, जो तू आठ महीने गायब रहा।
मुन्ना-नहीं है सेठ जी, कोई नहीं मेरे सिवा। मेरे माँ-पिता ने अपना फर्ज निभाया और अब मुझे अपना फर्ज निभाना है। पिता की सेवा का अवसर मिला ये तो मेरा सौभाग्य है, ज्यादा दिन उनकी सेवा नहीं कर पाया इसका दुख है। कितने कष्ट सहकर उन्होंने मुझे पाला पोसा था।
चमन सेठ-बस कर, ये तो हर माँ-बाप का फर्ज़ होता है, इसमें नई बात क्या है।

अच्छा नहीं लगता

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मंज़र दिल का उदास अच्छा नहीं लगता
तुम नहीं होते पास अच्छा नहीं लगता

तेरी क़दबुलन्दी से नहीं इनकार कोई
लेकिन छोटे एहसास, अच्छा नहीं लगता

जैसे भी हैं हम रहने दो वैसा ही हमको
बनके कुछ रहना खास अच्छा नहीं लगता

जब से तेरी यादों ने बसाया है घर दिल में
ये क़ाफ़िला-ए-अन्फास अच्छा नहीं लगता

ये मुखौटों से कह दो जाकर नदीश अब
सच का इतना भी पास अच्छा नहीं लगता

*चित्र साभार-गूगल

संवारा नहीं होता

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तूफ़ान में   कश्ती  को उतारा नहीं होता
उल्फ़त का अगर तेरी किनारा नहीं होता

ये सोचता हूँ, कैसे गुजरती ये ज़िन्दगी
दर्दों का जो है, गर वो सहारा नहीं होता

मेरी किसी भी रात की आती नहीं सुबह
ख़्वाबों को अगर तुमने संवारा नहीं होता

बढ़ती न अगर प्यास ये, आँखों की इस कदर
अश्क़ों को ढलकने का इशारा नहीं होता

महरूम हुए लोग वो लज्ज़त से दर्द की
जिनको भी दर्द-ए-ग़ैर गवारा नहीं होता

उभरे है अक़्स तेरा ख़्यालों में जब मेरे
आँखों में  कोई  और नज़ारा  नहीं होता

महके है तेरी याद से वो पल बहुत नदीश
जो  साथ तेरे  हमने  गुजारा  नहीं  होता
* रेखाचित्र-अनुप्रिया

जलते शहर से

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न मिले चाहे सुकूं तेरी नज़र से
बारहा गुजरेंगे पर उस रहगुज़र से

जिसके होंठो पे तबस्सुम की घटा है
आज पी ली है उसी के चश्मे-तर से

आपने समझा दिया मतलब वफ़ा का
आह उट्ठी है मेरे टूटे ज़िगर से

ग़मज़दा एहसास हैं, तन्हाइयां है
लौट आये हैं मुहब्बत के सफ़र से


फ़ोटो साभार-गूगल

आजमा कर दोस्तों को जा रहे हैं
हम लिए तबियत बुझी, जलते शहर से

थाम लेगा लग्ज़िश में हाथ मेरा
है नदीश उम्मीद मेरी, हमसफ़र से

तुम कभी आओ तो

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तुम कभी आओ तो
मैं घुमाऊँ तुमको
खण्डहर सी ज़िन्दगी के
उस कोने में जहाँ
अब भी पड़ीं हैं
अरमानों की अधपकी ईंटें
ख़्वाबों के अधजले टुकड़े
अहसास का बिखरा मलबा
उम्मीद का भुरभुरा गारा
तुम कभी आओ तो
मैं दिखाऊँ तुमको
खुशियों की बेरंग तस्वीरें
अश्कों का लबालब पोखर
धोखों के घने जाले
रिश्तों की चौड़ी दरारें
तुम कभी आओ तो

*रेखाचित्र-अनुप्रिया

आँखों में छिपाये रखना

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ख्वाब की तरह से आँखों में छिपाए रखना हमको दुनिया की निगाहों से बचाए रखना
बिखर न जाऊं कहीं टूटकर आंसू की तरह मेरे वजूद को पलकों पे उठाए रखना
आज है ग़म तो यक़ीनन ख़ुशी भी आएगी दिल में एक शम्मा तो उम्मीदों की जलाए रखना

तल्ख़ एहसास से महफूज़ रखेगी तुझको मेरी तस्वीर को सीने से लगाए रखना
ग़ज़ल नहीं, है ये आइना-ए-हयात मेरी अक्स जब भी देखना एहसास जगाए रखना
ग़मों के साथ मोहब्बत है ये आसान नदीश ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाए रखना 
*रेखाचित्र-अनुप्रिया

पतझड़ के बाद की बहार

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शेष भाग...
अपने कमरे पहुंच के मनु की आँखे नम हो गई। उसके कानों में बार-बार पापा की बात ही गूँज रही थी। उसने जैसे तैसे खुद को सयंत किया। इतने आर्ष का फोन आ गया, लेकिन उसने काट दिया। इधर फोन कटने से आर्ष भी परेशान हो रहा था। उधर विनय मनु और आर्ष के रिश्ते को लेकर परेशान था। उसे सिर्फ दोनों परिवारों के बीच जो बड़ा आर्थिक अंतर था, वो बात परेशान किए जा रही थी। जैसे तैसे ये दिन गुज़र गया। दूसरे दिन उसने महसूस किया कि मनु गुमसुम है, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा, वहीं मनु पूरी कोशिश कर रही थी कि वो सामान्य नज़र आये। इसी तरह कुछ दिन बीत गए। अगले रविवार को आर्ष का फोन विनय के पास आया... हेलो अंकल मैं आर्ष बोल रहा हूँ हाँ कहो आर्ष.. विनय ने सामान्य होते हुए कहा मेरे मम्मी-पापा आपसे मिलना चाहते हैं, आर्ष ने जवाब दिया लेकिन... कुछ कहते हुए विनय रुक गया और फिर कहा ठीक है, कब मिलने आ रहे हो आज शाम ही, आर्ष ने जवाब दिया आज शाम, विनय ने हड़बड़ाते हुए कहा हाँ, आप परेशान न होइए और कुछ तामझाम करने की भी जरूरत नहीं,  हम लोग शाम 7 बजे आएंगे..आर्ष बोला और फोन काट दिया फोन कटने के विनय ने अरु को आवाज़ दी... अरु कहाँ ह…