Posts

Showing posts with the label blog

ईश्वर से प्रेम करना सिखाएं, डरना नहीं

Image
आस्थावानों के लिए ईश्वर एक सार्वभौमिक शक्ति है, जिसे विभिन्न रूपों में पूजा जाता है। जिसे हम भक्ति कहते हैं, वो भी प्रेम का ही एक अंग है। प्रेम जब अपने चरम पर पहुंचता है, तो भक्ति में परिवर्तित हो जाता है, जिसे ज्ञानी प्रेमयोग भी कहते हैं। हम सब आस्थावान ईश्वर के किसी न किसी रूप की पूजा करते ही हैं।
हम में से बहुतेरे अमूमन एक गलती करते ही हैं, जो ईश्वर साक्षात प्रेम स्वरूप है, हम उसी से अपने से छोटों, खासकर बच्चों को डराकर रखते हैं। ऐसा मत करो नहीं तो ईश्वर पाप देंगे, वैसा मत करो नहीं तो ईश्वर दंड देंगे। लेकिन सोचने वाली बात ये है कि क्या ये कहने से बच्चे ऐसा करना बंद कर देते हैं। नहीं बल्कि इसका उल्टा प्रभाव पड़ता है और वे ईश्वर के समीप जाने की बजाय दूर होने लगते हैं। वे या तो अनिच्छा से पूजा-पाठ करते हैं या उनके मन में समाये डर के कारण। धीरे-धीरे वे अनमने मन से धार्मिक अनुष्ठानों में सम्मिलित होते हैं। उन्हें डर होता है कि कोई गलती हो गई तो, उन्हें पता नहीं क्या दंड मिले। और ऐसे में कोई अनहोनी हो जाये तो, वे अंधविश्वासी होने लगते हैं। ईश्वर का प्रेम जहां उन्हें आत्मविश्वासी बना सकता…

फेफड़ों को खुली हवा न मिली

Image
फेफड़ों को खुली हवा न मिली
न मिली आपसे वफ़ा न मिली

दुश्मनी ढूँढ़-ढूंढ़ कर हारी
दोस्ती है जो लापता न मिली

वक़्त पे छोड़ दिया है सब कुछ
दर्दे-दिल की कोई दवा न मिली

हर किसी हाथ में मिला खंज़र
आपकी बात भी जुदा न मिली

है न हैरत, जहां में कोई भी
खुशी, ग़मों से आशना न मिली

सोचता है नदीश ये अक्सर
ज़िन्दगी आपके बिना न मिली



चित्र साभार-गूगल

मिला जो शख़्स

Image
बिछड़ते वक़्त तेरे अश्क़ का हर इक क़तरा लिपट के रास्ते से मेरे तरबतर निकला
खुशी से दर्द की आँखों में आ गए आंसू मिला जो शख़्स वो ख़्वाबों का हमसफ़र निकला
रोज दाने बिखेरता है जो परिंदों को उसके तहख़ाने से कटा हुआ शजर निकला
हर घड़ी साथ ही रहा है वो नदीश मेरे दर्द का एक पल जो खुशियों से बेहतर निकला

ज़िन्दगी की किताब के पन्ने

Image
आँखों में  फिर चमकने लगे हैं  यादों के कुछ लम्हें गूंजने लगी हैं कान में  वो तमाम बातें  जो कभी हमने की ही नहीं  नज़र आई कुछ तस्वीरें  जो वक़्त ने खींच ली होगी  और तुम्हारा ही नाम  पढ़ रहा था हर कहीं  जब पलट रहा था मैं  ज़िन्दगी की किताब के पन्ने

अमरबेल की तरह

Image
दिल के शज़र की
इक शाख़ पे
इक रोज़
रख दिया था बेचैनी ने
तेरी याद का
इक टुकड़ा
और आज़
दिल के शजर की
कोई शाख़ नहीं दिखती
तेरी याद ने ढ़ाँक लिया है
अमरबेल की तरह
अब वहाँ
दिल नहीं है
सिर्फ तेरी याद है

एहसास की डोलची

Image
दिल के कमरे में अब
पसर चुकी है वीरानी
ख़्वाबों की अलमारी
कब से पड़ी है खाली
उम्मीदों की तस्वीरों ने
खो दिए हैं रंग अपने
आस की खिड़की भी
अब कभी नहीं खुलती
अश्क़ों की नमी से ऊग आई
एक कोने में यादों की काई
हाँ
ठसाठस भरी है दर्द से एहसास की डोलची




तेरे इंतज़ार की बोझल आँखें शाम ढ़लते-ढ़लते हो जाती है ना-उम्मीद तब तन्हाई के बिछौने पे तेरी यादें ओढ़कर सो जाता हूँ क्योंकि कुछ ख़्वाब इन आँखों की राह तकते हैं चित्र साभार-गूगल

इक तेरे जाने के बाद

Image
हर शाम ग़मगीं सी
हर सुबह उनींदी सी
हर ख़्याल खोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर वक़्त बिखरा सा
हर अश्क़ दहका सा
एहसास भिगोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर दर्द महका सा
हर वक़्त तन्हा सा
हर ख़्वाब रोया सा
इक तेरे जाने के बाद
हर सांस चुभती सी
हर बात कड़वी सी
हर नाम ढ़ोया सा
इक तेरे जाने के बाद


शब्द बिखर जाते हैं

Image
अक्सर शब्द बिखर जाते हैं
कोशिश बहुत करता हूँ, कि
शब्दों को समेट कर
कोई कविता लिखूं
पर ये हो नहीं पाता
कोशिश बहुत करता हूँ कि
एहसास समेट कर रखूं
पर ये हो नहीं पाता
तकिये पर बिखरे अश्क़ों की तरह
अक्सर शब्द बिखर जाते हैं

शायद तुम नहीं जानती

Image
शायद तुम नहीं जानती मैंने रोक रक्खा है पलकों के भीतर आंसुओं के समंदर में  उठने वाले ज्वार को बनाकर यादों का तटबंध कुछ लहरें फिर भी तोड़ देती हैं तटबंध और तन्हाई के साहिल पे छोड़ जाती हैं नमक के किरचे जो चुभ जाते हैं सुकून के पाँव में और सुनाई देती है करीब आते दर्द की आहट कुछ तस्वीरें दर्द की खींच कर वक्त ने टंगा दी हैं दिल की दीवार पे ठोक के एहसास की कीलें जो चुभती हैं हर सांस की जुंबिश पर फिर रो पड़ते हैं ख़्वाब मोहब्बत के और भिगो देते हैं पलकों की कोरों को 🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸




🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸 आँखों की दहलीज़ पे  बैठे कुछ ख़्वाब, कब से राह देख रहे हैं नींद की और नींद भटक रही है यादों के सहरा में सुकून के जुगनुओं का पीछा करते हुए... ज़िद पे अड़ी थी नींद आँखों की तलाशी लेने और मिला क्या कुछ सुबकते हुए ख़्वाब चंद धुंधली सी तश्वीरें एक दरिया अश्कों का जिसमें तैरती अरमानों की लाशें 🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸🔸

ज़िन्दगी मुस्कुरा दी

Image
साँसों ने चाहा ओ' दिल ने दुआ दी मिला साथ तेरा ज़िन्दगी मुस्कुरा दी
सोचा था भुलाऊंगा यादों को तेरी मगर याद ने सारी दुनिया भुला दी
ग़ज़ब कर दिया मेरे एहसास ने भी मुहब्बत को तन्हाइयों की सज़ा दी
वही कह रहे हैं मुझे बेवफ़ा अब जिन्हें तोहफ़े में हम ही ने वफ़ा दी
उसकी आरज़ू में नदीश हमने अपनी उम्र ये सारी तन्हा तन्हा बिता दी

सौग़ात हो गई

Image
पल भर तुमसे बात हो गई
ख़ुशियों की सौग़ात हो गई

दुश्मन है इन्सां का इन्सां
कैसी उसकी जात हो गई

आँखों में है एक कहकशां
अश्कों की बारात हो गई

वक़्त, वक़्त ने दिया ही नहीं
बातें  अकस्मात  हो  गई

जख़्म मिले ता-उम्र जो नदीश
रिश्तों  की  सौग़ात  हो गई


चित्र साभार-गूगल

सोया हुआ ज्वालामुखी

Image
हलचल सी मची है
उम्मीदों की बस्ती में
गिरने लगे हैं
तमन्ना के झुलसे हुये शजर 
कुछ ही देर में ढाँक लेगा
अहसास के आसमां को
पिघले हुये ख़्वाबों का
लावा और गुबार
क्योंकि 
आँखों में फूट पड़ा है
वादी-ए-ख़्वाब में
सोया हुआ ज्वालामुखी...
चित्र साभार-गूगल

न सोई आँखें

ख़्वाब जिसके तमाम उम्र संजोई आँखें
उसकी यादों ने आंसुओं से भिगोई आँखें

तेरे ख़्वाबों की हर एक वादा खिलाफी की कसम
मुद्दतें हो गई है फिर भी न सोई आँखें

जिक्र छेड़ो न अभी यार तुम जमाने का
हुस्न के ख़्वाबों-ख्यालों में है खोई आँखें

फूल में याद के बिखरी हुई है शबनम सी
रात भर यूँ लगे है जैसे कि रोई आँखें

हाले-दिल कह न सके हम भी और नदीश यहाँ
मेरी आँखों को भी न पढ़ सकी कोई आँखें

प्यार आपका मिले

Image
गुलों की राह के कांटे सभी खफ़ा मिले मुहब्बत में वफ़ा की ऐसी न सज़ा मिले
अश्क़ तो उसकी यादों के क़रीब होते हैं तिश्नगी ले चल जहाँ कोई मैक़दा मिले
कहूँ कैसे मैं कि इस शहर-ए-वफ़ा में मुझको जितने भी मिले लोग सभी बेवफ़ा मिले
राह में रौशनी की, थे सभी हमराह मेरे अँधेरे बढ़ गए तो साये लापता मिले
आओ तन्हाई में दो-चार बात तो कर लो महफ़िल में तुम हमें मिले तो क्या मिले
क्या यही हासिल-ए-वफ़ा है, परेशान हूँ मैं कुछ तो आंसू, ख़लिश ओ दर्द के सिवा मिले
आप पे हो किसी का हक़ तो वो नदीश का हो और मुझको ही फ़क़त प्यार आपका मिले चित्र साभार- गूगल

अधिकार याद रहे कर्तव्य भूल गए

Image
15 अगस्त को भारत वर्ष में स्वतंत्रता दिवस बड़े ही हर्षोल्लास और धूमधाम से मनाया जाता है। हर्ष इस बात का कि इस दिन हमें आजादी मिली और धूम इस बात की कि अब हम पूरी स्वतत्रंता से अपनी मनमानी कर सकते हैं। गाहे-बगाहे हम स्वतंत्रता की बात करते हुए अपने अधिकारों के लिये लड़ते हैं। जो मन होता है कह देते हैं और जब हमारे कहे का विरोध होता है तब इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार कहते हुए सही ठहराते हैं। हम अपने अधिकारों के लिये पूरी शक्ति से लड़ते हैं और इसका अतिक्रमण होने पर पुरजोर विरोध भी करते हैं, लेकिन अधिकारों की लड़ाई में हम अपने कर्तव्य भूल जाते हैं। ज्ञात रहे कि हमें संविधान ने 6 मौलिक अधिकार दिए हैं, लेकिन हमारे 11 मूल कर्तव्य भी हैं। ये सही है कि हमें अपने अधिकारों के प्रति सजग रहना चाहिए, लेकिन अपने कर्तव्यों को भी नहीं भूलना चाहिये।
संविधान ने हमें जो मौलिक अधिकार दिए गए वो इसलिए ताकि कोई हमारी आज़ादी न छीन सके, हमारा शोषण न कर सके। लेकिन अधिकारों को पाकर हम इतने उन्मुक्त न हों जाएं कि अपने कर्तव्यों को भूल जाएं और इससे हमारे समाज और देश का अपयश हो। हमें संविधान द्वारा मूल रूप से सा…

महके है तेरी याद से

Image
तूफ़ान में   कश्ती  को उतारा नहीं होता उल्फ़त का अगर तेरी किनारा नहीं होता
ये सोचता हूँ, कैसे गुजरती ये ज़िन्दगी दर्दों का जो है, गर वो सहारा नहीं होता
मेरी किसी भी रात की आती नहीं सुबह ख़्वाबों को अगर तुमने संवारा नहीं होता
बढ़ती न अगर प्यास ये, आँखों की इस कदर अश्क़ों को ढलकने का इशारा नहीं होता
महरूम हुए लोग वो लज्ज़त से दर्द की जिनको भी दर्द-ए-ग़ैर गवारा नहीं होता
उभरे है अक़्स तेरा ख़्यालों में जब मेरे आँखों में  कोई  और नज़ारा  नहीं होता
महके है तेरी याद से वो पल बहुत नदीश जो  साथ तेरे  हमने  गुजारा  नहीं  होता
चित्र साभार-गूगल

छांव बेच आया है-क़तआत

Image
चला शहर को तो वो गांव बेच आया है अजब मुसाफ़िर है जो पांव बेच आया है मकां बना लिया माँ-बाप से अलग उसने शजर ख़रीद लिया छांव बेच आया है - तेरे ही साथ को सांसों का साथ कहता हूँ तुझी को मैं, तुझी को कायनात कहता हूँ तेरी पनाह में गुज़रे जो चंद पल मेरे बस उन्ही लम्हों को सारी हयात कहता हूँ - प्यार की रोशनी से माहताब दिल हुआ तेरी इक निगाह से बेताब दिल हुआ हजार गुल दिल में ख़्वाबों के खिल गए तेरी नज़दीकियों से शादाब दिल हुआ - पल-पल बोझल था, मगर कट गई रात सहर के उजालों में सिमट गई रात डरा रही थी अंधेरे के ज़ोर पर मुझे जला जो दिले-नदीश तो छंट गई रात - - रंग भरूँ शोख़ी में आज शाबाबों का रुख़ पे तेरे मल दूँ अर्क गुलाबों का होंठों का आलिंगन कर यूं, होंठों से हो जाये श्रृंगार हमारे ख़्वाबों का - किनारों से बहुत रूठा हुआ है कलेजा नाव का सहमा हुआ है पटकती सर है, ये बेचैन लहरें समंदर दर्द में डूबा हुआ है - चित्र साभार-गूगल

जुगनू से बिखर जाते हैं

Image
जब भी यादों में सितमगर की उतर जाते हैं  काफ़िले दर्द के इस दिल से गुज़र जाते हैं
तुम्हारे नाम की हर शै है अमानत मेरी  अश्क़ पलकों में ही आकर के ठहर जाते हैं
किसी भी काम के नहीं ये आईने अब तो अक्स आँखों में देखकर ही संवर जाते हैं
इस कदर तंग है तन्हाईयाँ भी यादों से रास्ते भीड़ के तनहा मुझे कर जाते हैं
देखकर तीरगी बस्ती में उम्मीदों की मिरे अश्क़ ये टूटकर जुगनू से बिखर जाते हैं
बसा लिया है दिल में दर्द को धड़कन की तरह ज़ख्म, ये वक़्त गुजरता है तो भर जाते हैं
खिज़ां को क्या कभी ये अफ़सोस हुआ होगा उसके आने से ये पत्ते क्यों झर जाते हैं
बुझा के रहते हैं दिये जो उम्मीदों के नदीश रह-ए-हयात में होते हुए मर जाते हैं  चित्र साभार- गूगल

बेकल बेबस तन्हा मौसम

Image
बिखरी शाम सिसकता मौसम बेकल बेबस तन्हा मौसम
तन्हाई को समझ रहा है लेकर चाँद खिसकता मौसम
शब के आंसू चुनने आया लेकर धूप सुनहरा मौसम
चाँद चौदहवीं का हो छत पर फिर देखो मचलता मौसम
जुल्फ चांदनी की बिखराकर बनकर रात महकता मौसम
खिलती कलियों की संगत में फूलों सा ये खिलता मौसम
तेरी यादों की बूंदों से ठंडा हुआ दहकता मौसम
धूप-छांव बनकर नदीश की ग़ज़लों में है ढलता मौसम

देश कहाँ है

Image
इन दिनों देश में एक विचित्र सा वातावरण निर्मित हो गया है। लोगों और समुदायों का आपसी विरोध, देश विरोध तक जा पहुंचा है। इससे न देश में प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है, बल्कि सात समंदर पार भी देश की छवि धूमिल हो रही है।

इन दिनों स्थिति ये है कि एक पक्ष कहे कि स्वेदशी अपनाओं तो दूसरा पक्ष देशी कंपनियों की बुराई आरम्भ कर देता है, वहीं दूसरा पक्ष कहे कि ये गलत है, तो पहला पक्ष उसे सही साबित करने में जुट जाता है और इनके बीच की लड़ाई में देश कहीं खो जाता है। देश प्रथम की भावना और मानसिकता का पूरी तरह लोप हो चुका है। कैसी विडंबना है कि कोई ये नहीं सोचता कि देश बचा रहेगा तो हम बचे रहेंगे।

इन सब में एक तीसरा पक्ष भी है, जो बहुत ही भयावह है। जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तीसरे पक्ष का इतिहास बताता है कि वो दुश्मनों के साथ ही रहा है। इन पक्षों के आपसी विरोध में देश कहीं नहीं होता। होता है तो बस स्वहित, लोभ और शक्ति सम्पन्न बनने की हवस। वर्तमान में व्यक्ति पूजा ने देश और देशहित को कहीं पीछे धकेल दिया है। आज सभी पक्षों में आपसी विरोध इतना हो चुका है कि सब एक दूसरे को नेस्तनाबूद कर देना चाहते है…