संवरती रही ग़ज़ल


जब भी मेरे ज़ेह्न में संवरती रही ग़ज़ल 

तेरे ही ख़्यालों से महकती रही ग़ज़ल

झरते रहे हैं अश्क़ भी आँखों से दर्द की 

और उँगलियां एहसास की लिखती रही ग़ज़ल

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