संवरती रही ग़ज़ल


जब भी मेरे ज़ेह्न में संवरती रही ग़ज़ल 

तेरे ही ख़्यालों से महकती रही ग़ज़ल

झरते रहे हैं अश्क़ भी आँखों से दर्द की 

और उँगलियां एहसास की लिखती रही ग़ज़ल

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नींद का बिस्तर नहीं मिला

देखते देखते

प्यार करें

महके है तेरी याद से

ठंडी हवा की आँच

कितना मुश्किल रहा है वो

सैकड़ों खानों में

घटा से धूप से और चांदनी से चाहते क्या हो?

प्यार आपका मिले

दिल की हर बात