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ख़्वाब सुनहरा कोई

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राह  तकता ही  रहा  ख़्वाब सुनहरा कोई नींद पे  मेरी लगा  कर  गया  पहरा  कोई
ढूंढती है मेरे एहसास की तितली फिर से तेरी आँखों  में,  मेरी याद का सहरा कोई
चीखती है मेरी नज़र से ख़ामोशी अब तो आईना  दे के  मुझे  ले  गया  चेहरा कोई
जो रख दिए हैं कदम, राहे-मोहब्बत में नदीश फिर जहां लाख सदा दे, नहीं ठहरा कोई
चित्र साभार-गूगल

तनहा रहा है

वफ़ा का फिर सिला धोखा रहा है बस अपना तो यही किस्सा रहा है
उन्ही जालों में खुद ही फंस गया अब जिन्हें रिश्तों से दिल बुनता रहा है
समेटूं  जीस्त के सपने नज़र में मेरा अस्तित्व तो बिखरा रहा है
बुझी आँखों में जुगनू टिमटिमाये कोई भूला हुआ याद आ रहा है
ख्यालों में तेरे खोया है इतना  नदीश हर भीड़ में तनहा रहा है