ज़ख्म-ए-दिल मेरा मुस्कुराने लगा

वार जब भी तेरा याद आने लगा
ज़ख्म-ए-दिल मेरा मुस्कुराने लगा

लाखों दर्द अपने दिल मे छिपाये हुए
अपने चेहरे पे खुशियां सजाये हुए
खो गया मैं रिवाजों की इस भीड़ में
और खुद से ही खुद को छिपाने लगा

ज़ख्म ख्वाबों के रिसते रहे रातभर
दर्द कदमों पे बिछते रहे रातभर
तेरे वादों के जख्मों पे फिर मैं सनम
तेरी यादों का मरहम लगाने लगा

धूप खिलवत की तन को भिगोती रही
चाहतें रात भर मेरी रोती रही
फिर भी पतवार उम्मीद की थामकर
सब्र की धार मैं आजमाने लगा

हर खुशी को क्यूँ मुझसे ही तकरार था
क्यूँ निशाने पे ग़म के मैं हर बार था
जब भी, जो भी रुचा छिन गया मुझसे वो
जो मेरा था मुझे मुंह चिढ़ाने लगा

19 comments:

  1. सुंदर, भाव मयी प्रवाहमयी

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  2. बहुत शुक्रिया रंगराज जी

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  3. शुक्रिया विक्रम सर

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  4. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 19 मई 2017 को लिंक की गई है.................. http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. जी बिल्कुल आदरणीया

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  6. हर खुशी को क्यूँ मुझसे ही तकरार था
    क्यूँ निशाने पे ग़म के मैं हर बार था
    जब भी, जो भी रुचा छिन गया मुझसे वो
    जो मेरा था मुझे मुंह चिढ़ाने लगा

    सुन्दर अभिव्यक्ति ! आभार

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  7. शुक्रिया ध्रुव सर

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  8. बहुत सुन्दर...
    खुद से ही खुद को छुपाने लगा....
    बहुत ही सुनदर.....लाजवाब.....
    वाह!!!!!
    http://eknayisochblog.blogspot.in

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  9. वाह्ह्ह...लाज़वाब👌👌

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  10. ज़िन्दगी में बनते -बिगड़ते रिश्तों का सच कसक और कशिश के साथ उभरता है। विछोह और तड़पाने की मंशा में बिलखते ,कराहते दिल के जज़्बात जब अभिव्यक्ति बनकर उभरते हैं और वफ़ा को यद् करते हैं तो पाठक के अंतःकरण को छू लेते हैं। बधाई !

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  11. ज़िन्दगी में बनते -बिगड़ते रिश्तों का सच कसक और कशिश के साथ उभरता है। विछोह और तड़पाने की मंशा में बिलखते ,कराहते दिल के जज़्बात जब अभिव्यक्ति बनकर उभरते हैं और वफ़ा को यद् करते हैं तो पाठक के अंतःकरण को छू लेते हैं। बधाई !

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  12. भावनओं की स्पर्शी अभिव्यक्ति

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