Sunday, June 25, 2017

संवारा नहीं होता

तूफ़ान में   कश्ती  को उतारा नहीं होता
उल्फ़त का अगर तेरी किनारा नहीं होता

ये सोचता हूँ, कैसे गुजरती ये ज़िन्दगी
दर्दों का जो है, गर वो सहारा नहीं होता

मेरी किसी भी रात की आती नहीं सुबह
ख़्वाबों को अगर तुमने संवारा नहीं होता

बढ़ती न अगर प्यास ये, आँखों की इस कदर
अश्क़ों को ढलकने का इशारा नहीं होता

महरूम हुए लोग वो लज्ज़त से दर्द की
जिनको भी दर्द-ए-ग़ैर गवारा नहीं होता

उभरे है अक़्स तेरा ख़्यालों में जब मेरे
आँखों में  कोई  और नज़ारा  नहीं होता

महके है तेरी याद से वो पल बहुत नदीश
जो  साथ तेरे  हमने  गुजारा  नहीं  होता
* रेखाचित्र-अनुप्रिया

Wednesday, June 21, 2017

जलते शहर से

न मिले चाहे सुकूं तेरी नज़र से
बारहा गुजरेंगे पर उस रहगुज़र से

जिसके होंठो पे तबस्सुम की घटा है
आज पी ली है उसी के चश्मे-तर से

आपने समझा दिया मतलब वफ़ा का
आह उट्ठी है मेरे टूटे ज़िगर से

ग़मज़दा एहसास हैं, तन्हाइयां है
लौट आये हैं मुहब्बत के सफ़र से


फ़ोटो साभार-गूगल

आजमा कर दोस्तों को जा रहे हैं
हम लिए तबियत बुझी, जलते शहर से

थाम लेगा लग्ज़िश में हाथ मेरा
है नदीश उम्मीद मेरी, हमसफ़र से

Monday, June 19, 2017

तुम कभी आओ तो

तुम कभी आओ तो
मैं घुमाऊँ तुमको
खण्डहर सी ज़िन्दगी के
उस कोने में जहाँ
अब भी पड़ीं हैं
अरमानों की अधपकी ईंटें
ख़्वाबों के अधजले टुकड़े
अहसास का बिखरा मलबा
उम्मीद का भुरभुरा गारा
तुम कभी आओ तो
मैं दिखाऊँ तुमको
खुशियों की बेरंग तस्वीरें
अश्कों का लबालब पोखर
धोखों के घने जाले
रिश्तों की चौड़ी दरारें
तुम कभी आओ तो

*रेखाचित्र-अनुप्रिया

Saturday, June 17, 2017

आँखों में छिपाये रखना

ख्वाब की तरह से आँखों में छिपाए रखना
हमको दुनिया की निगाहों से बचाए रखना

बिखर न जाऊं कहीं टूटकर आंसू की तरह
मेरे वजूद को पलकों पे उठाए रखना

आज है ग़म तो यक़ीनन ख़ुशी भी आएगी
दिल में एक शम्मा तो उम्मीदों की जलाए रखना


तल्ख़ एहसास से महफूज़ रखेगी तुझको
मेरी तस्वीर को सीने से लगाए रखना

ग़ज़ल नहीं, है ये आइना-ए-हयात मेरी
अक्स जब भी देखना एहसास जगाए रखना

ग़मों के साथ मोहब्बत है ये आसान नदीश
ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाए रखना 

*रेखाचित्र-अनुप्रिया

Friday, June 16, 2017

पतझड़ के बाद की बहार

शेष भाग...
अपने कमरे पहुंच के मनु की आँखे नम हो गई। उसके कानों में बार-बार पापा की बात ही गूँज रही थी। उसने जैसे तैसे खुद को सयंत किया। इतने आर्ष का फोन आ गया, लेकिन उसने काट दिया।
इधर फोन कटने से आर्ष भी परेशान हो रहा था।
उधर विनय मनु और आर्ष के रिश्ते को लेकर परेशान था। उसे सिर्फ दोनों परिवारों के बीच जो बड़ा आर्थिक अंतर था, वो बात परेशान किए जा रही थी।
जैसे तैसे ये दिन गुज़र गया। दूसरे दिन उसने महसूस किया कि मनु गुमसुम है, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा, वहीं मनु पूरी कोशिश कर रही थी कि वो सामान्य नज़र आये। इसी तरह कुछ दिन बीत गए। अगले रविवार को आर्ष का फोन विनय के पास आया...
हेलो अंकल मैं आर्ष बोल रहा हूँ
हाँ कहो आर्ष.. विनय ने सामान्य होते हुए कहा
मेरे मम्मी-पापा आपसे मिलना चाहते हैं, आर्ष ने जवाब दिया
लेकिन... कुछ कहते हुए विनय रुक गया और फिर कहा ठीक है, कब मिलने आ रहे हो
आज शाम ही, आर्ष ने जवाब दिया
आज शाम, विनय ने हड़बड़ाते हुए कहा
हाँ, आप परेशान न होइए और कुछ तामझाम करने की भी जरूरत नहीं,  हम लोग शाम 7 बजे आएंगे..आर्ष बोला और फोन काट दिया
फोन कटने के विनय ने अरु को आवाज़ दी...
अरु कहाँ हो यार, जल्दी आओ
क्या हुआ, तेजी से आती अरु ने पूछा
अरे आर्ष का फोन आया था, आज शाम अपने मम्मी-पापा के साथ घर आ रहा है
आज शाम, अरे इतने जल्दी तैयारी कैसे होगी अरु ने चिंता जताई
हाँ वही तो, आर्ष तो कह रहा है कि कुछ करने की जरूरत नहीं, लेकिन शहर की इतनी बड़ी शख्सियत घर आये तो कुछ करना ही होगा न.. विनय ने कहा
अरु तुम घर को थोड़ा व्यवस्थित कर लो और हाँ नए पर्दे वगैरह लगा लो मैं बाजार से नास्ते पानी की व्यवस्था कर के आता हूं
ऐसा कहकर विनय चला गया
विनय के जाते ही अरु ने मनु को आवाज़ दी और आर्ष के आने की बात बताई
आर्ष के आने की खबर सुन मनु के चेहरे पे हल्की सी मुस्कान आ गई, लेकिन उसके मन में अब भी पापा की बात ही घूम रही थी।
शाम को निर्धारित समय पर आर्ष अपने मम्मी पापा के साथ मनु के घर पे था
बैठक में बैठे आयुर्वेदाचार्य जी ने विनय से कहा कि हम मनु को अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं।
 विनय के मन में काफी कुछ चल रहा था, उसकी सबसे बड़ी शंका दोनों परिवारों के बीच का आर्थिक अंतर था, जो बहुत ज्यादा था। आयुर्वेदाचार्य की जी गिनती शहर के बड़े रईसों में होती है, जिसे लेकर विनय काफी असहज था और उसके लग रहा था, कि कहीं मनु को वहां परेशानियां न हो। समाज और शहर के लोगों के बीच होने वाली तरह-तरह की बातें को लेकर विनय परेशान था और उस समय भी उसका ध्यान आयुर्वेदाचार्य जी की बात पर नहीं था।
विनय को खोया देख कर आयुर्वेदाचार्य जी ने फिर कहा, कहां खोये हैं विनय बाबू
विनय ने एकदम चौंक कर देखा, जी कुछ नहीं बेटी की शादी की बात है न इसलिए बहुत कुछ सोचना पड़ता है, ये कहते हुए विनय ने बात संभाली।
अरे विनय बाबू ज्यादा मत सोचिये हमारी भी एक बेटी है, इस बात को अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए मैं खुद आपके पास आया हूँ, हमें मनु बहुत पसंद हैं और हम इसे अपने घर की बहू बनाना चाहते हैं।
जी आप मनु से मिल चुके हैं, विनय ने चौंक कर पूछा...
हाँ, जब आर्ष को देखने आती थी, तब हमसे भी मिलती थी, सच कहें तो हमने मनु का उसी समय पसंद कर लिया था और हम इनकी शादी की बात करने वैसे भी आते, लेकिन अब ये दोनों एक दूसरे को पसंद करते हैं और शादी करना चाहते हैं, तो हमें क्या एतराज होना चाहिए।
लेकिन आपके और हमारे बीच जो अंतर है, उसका भय है हमें, विनय ने कहा।
अरे आप तो नाहक ही परेशान हो रहे हैं, विनय बाबू। आयुर्वेदाचार्य जी ने कहा देखिये बच्चों की खुशी देखिये, बाकी सब भूल जाईये, रही अंतर की बात तो वहां कोई समस्या नहीं है, बस आप हाँ कर दीजिये, आपकी बेटी को कभी कोई परेशानी नहीं होगी।
आयुर्वेदाचार्य की जी के आग्रह को विनय एकदम से मना नहीं कर पाया, फिर भी उसने कुछ दिन सोचने का समय माँग लिया।
आयुर्वेदाचार्य जी के जाने के बाद विनय और अरू में मनु को लेकर काफी देर तक बात हुई। विनय अब भी सशंकित था, इसलिए उसने दूसरे दिन आयुर्वेदाचार्य जी को इस रिश्ते के लिए मना कर दिया और मनु के लिए दूसरा लड़का ढूँढने की तैयारी की जाने लगी।
दिन बीतने के साथ ही मनु को भी अपना जीवन भारी लग रहा था, उसे बार-बार आर्ष की याद उदास कर रही थी, इस बीच उसने आर्ष से बात करना भी काफी कम कर दिया था। जैसे जैसे आर्ष उसे दूर होता दिखाई देता वैसे वैसे उसे लगता कि अब बहार कभी नहीं आयेगी। उसे हर तरफ पतझड़ ही दिखाई दे रहा था।
इधर विनय के मना कर देने के बाद आर्ष भी बहुत परेशान था और मनु की स्थिति भी बहुत खराब थी, लेकिन वो पापा के सामने सामान्य रहने की नाटक करती रही। इस तरह छै महीने का समय बीत गया, लेकिन मनु के लिए विनय कोई योग्य वर नहीं ढूँढ पाया।
एक दिन शाम को अचानक घर की घंटी बजी तो विनय ने दरवाजा खोला सामने आयुर्वेदाचार्य जी को देखकर एकदम से चौंक गया, फिर बोला आईये अंदर आईये
अंदर आने के बाद सोफे पर बैठते हुए आयुर्वेदाचार्य जी बोले, विनय बाबू आप क्या सोच रहे हैं और आपके मन में क्या शंका है मैं नहीं जानता, लेकिन इन दोनों बच्चों के मन को समझ रहा हूँ, इसलिए आपके पास आया हूँ, कृप्या इन बच्चों की खुशी मत छीनों। आपके मन में जो भी है आप नि:संकोच मुझसे कह सकते हैं।
आयुर्वेदाचार्य जी के इस तरह कहने पर विनय ने अपने मन की बात कह दी, देखिये आयुर्वेदाचार्य जी हम सामान्य आर्थिक स्थिति की लोग हैं, वहीं मैं एक बेटी का बाप हूँ, मुझे अपनी बेटी की चिंता है। वो आपकी सोसायटी में कैसे खुद को ढाल पायेगी।
अच्छा तो इन बातों को लेकर परेशान हैं विनय बाबू, आयुर्वेदाचार्य जी ने कहा मैं समझ सकता हूँ, लेकिन आप को मैं विश्वास दिलाता हूँ, जो आपकी शंकायें व्यर्थ हूँ जो आप सोच रहे हैं, वैसा कभी नहीं होगा, आपकी बेटी बहू कम बेटी बनकर ज्यादा रहेगी। रही बात आर्थिक अंतर की तो रहन-सहन और खान-पान के मामले हम और आप बिल्कुल बराबर हैं, ये बात तो मनु भी जानती है, आयुर्वेदाचार्य जी ने कहा और ज्यादा शंका हो तो आईये कभी हमारे घर।
ठीक है हम जल्दी ही आयेंगे, विनय ने जवाब दिया। इसके बाद आयुर्वेदाचार्य जी चले गये।
उनके जाने के बाद मनु और विनय के बीच बहुत देर तक इसी विषय पर बात होती, फिर दोनों ने तय किया कि एक बार वे आयुर्वेदाचार्य जी के घर जायेंगे। अगले रविवार को दोनों आयुर्वेदाचार्य जी घर पहुंचे, जहां उन्हें सच में काफी आश्चर्य हुआ कि शहर के इतने बड़े रईस और इतना साधारण रहन-सहन। दोनों इस बात से काफी प्रभावित हुये और फिर आयुर्वेदाचार्य जी के परिवार से मिलकर उन्हें काफी अच्छा लगा, जिसके बाद विनय ने मनु और आर्ष के रिश्ते के लिए हांमी भर दी।
रिश्ते की बात पक्की होते ही दोनों की कुण्डलियां मिलाई गई। कुण्डलियां मिलाने वाले ज्योतिष ने इनकी शादी के लिए साफ मना कर दिया, कुण्डली नहीं मिल रही है, शादी करना शुभ नहीं होगा। ज्योतिष की बात ने एक बार फिर आर्ष और मनु को जुदा कर दिया। इस बार आयुर्वेदाचार्य जी भी थोड़ा परेशान थे, लेकिन अपने बेटे की खुशी के लिए वे मनु को बहू बनाने के लिए तैयार थे, लेकिन विनय फिर सशंकित हो उठा
विनय को समझाते हुए आयुर्वेदाचार्य जी ने कहा देखिये विनय बाबू कुण्डली का मिलान न होना बहुत बड़ी समस्या नहीं है, वैसे भी अब हम आधुनिक युग की ओर बढ़ रहे हैं, हमें इन बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
विनय ने सशंकित होकर कहा, आयुर्वेदाचार्य जी मुझे मनु के भविष्य की चिंता है, आगे पता नहीं क्या हो जाये।
वहां बहार का मौसम आते-आते फिर मनु की जीवन में पतझड़ शुरू हो गया, लेकिन इस बार मनु खुद को संभाल नहीं पाई और उसकी आँखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ पड़ा। ये देख अरू भी परेशान हो उठी, अब उसे लगा कि मनु की खुशी आर्ष के साथ ही है। कुछ देर सोचने अरू ने निश्चय कर लिया कि मनु के लिए अब वो कुछ करेगी, आखिर वो उसकी माँ है।
इधर आर्ष की हालत देखकर आयुर्वेदाचार्य जी एक बार फिर विनय से बात करने की ठानी।
उधर रात में कमरे में पहुंच कर बातों-बातों में अरू ने विनय से पूछा सुनो जी, वो प्रकाश की बेटी का कुछ पता चला। विनय, हाँ अब तो दोनों परिवार में सब अच्छा हो गया और प्रकाश बता रहा था कि उसकी बेटी बहुत खुश है और उसके सास-ससुर भी अच्छे हैं।
अच्छा अरू ने आश्चर्य से पूछा हाँ, विनय जवाब दिया।
सुनो आप सोचो अगर मनु ने ऐसा किया होता तो, लेकिन हमारी बेटी ने ऐसा नहीं किया। उसने हमें विश्वास में लिया, हमारी खुशी और इज्जत का ध्यान रखा। अब हमें भी अपनी बेटी की खुशी के बारे सोचना चाहिए। जब प्रकाश की बेटी बिना कुण्डली मिलाये शादी कर के खुश है तो हमें भी इस बारे में ज्यादा नहीं सोचना चाहिए।
अब विनय को सब कुछ समझ में आने लगा और उसने अरू से कहा तुम ठीक कह रही हो। मैं कल ही आयुर्वेदाचार्य जी से मिलता हूँ।
दूसरे दिन विनय और अरु मनु को लेकर आयुर्वेदाचार्य जी के घर पहुंचे।
आईये विनय बाबू, आयुर्वेदाचार्य जी ने विनय को घर में देखकर कहा।
क्षमा चाहता हूँ आयुर्वेदाचार्य जी, लेकिन मुझे लगता है, आपका कहना ठीक है हमें ज्यादा नहीं सोचना चाहिए।
अब बच्चों की खुशी के लिए हमें कुछ बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए।
विनय के ऐसा कहते ही आयुर्वेदाचार्य जी ने विनय को गले से लगा लिया।
इधर मनु के मन में फिर से पतझड़ के बाद की बहार की नई कोपलें फूटने लगी थीं।
समाप्त