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लौट गई तन्हाई भी

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दिल की उम्मीदों को सीने में छिपाए रक्खा इन चिरागों को हवाओं से बचाए रक्खा
हमसे मायूस होके लौट गई तन्हाई भी हमने खुद को तेरी यादों में डुबाए रक्खा
तिरे ख़्याल ने दिन-रात मुझे सताया है हुई जो रात तो ख़्वाबों ने जगाए रक्खा
वक़्त ने तो दी सदा मुझको मुसलसल लेकिन मिरी ही धड़कनों ने मुझको भुलाए रक्खा
 उमड़ पड़ा है ये तूफान देखकर तुमको मुद्दतों से जिसे इस दिल में दबाए रक्खा
 रही बिखेरती ख़ुश्बू नदीश की ग़ज़लें एक-एक हर्फ़ ने एहसास बनाए रक्खा चित्र साभार-गूगल

ख्वाब की तरह से

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ख्वाब की तरह से आँखों में छिपाए रखना हमको दुनिया की निगाहों से बचाए रखना
बिखर न जाऊं कहीं टूटकर आंसू की तरह मेरे वजूद को पलकों पे उठाए रखना
आज है ग़म तो यक़ीनन ख़ुशी भी आएगी दिल में एक शम्मा तो उम्मीदों की जलाए रखना
तल्ख़ एहसास से महफूज़ रखेगी तुझको मेरी तस्वीर को सीने से लगाए रखना
ग़ज़ल नहीं, है ये आइना-ए-हयात मेरी अक्स जब भी देखना एहसास जगाए रखना
ग़मों के साथ मोहब्बत है ये आसान नदीश ख़ुशी की ख्वाहिशों से खुद को बचाए रखना
रेखाचित्र-अनुप्रिया

चाँदनी की तरह

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प्यार हमने किया ज़िन्दगी की तरह
आप हरदम मिले अजनबी की तरह

मैं भी इंसां हूँ, इंसान हैं आप भी
फिर मिलते क्यों नहीं आदमी की तरह

मेरे सीने में भी इक धड़कता है दिल
प्यार यूँ न करें दिल्लगी की तरह

दोस्त बन के निभाई है जिनसे वफ़ा
दोस्ती कर रहे हैं दुश्मनी की तरह

हमको कोई गिला ग़म से होता नहीं
गर ख़ुशी कोई मिलती ख़ुशी की तरह


आज फिर से मेरे दिल ने पाया सुकूं
सोचकर आपको शायरी की तरह

ग़म की राहों में जब भी अंधेरे बढ़े
अश्क़ बिखरे सदा चाँदनी की तरह

काश दिल को तुम्हारे ये आता समझ
इश्क़ मेरा नहीं हर किसी की तरह

याद आई है जब भी तुम्हारी नदीश
तीरगी में हुई रोशनी की तरह


चित्र साभार-गूगल

फेफड़ों को खुली हवा न मिली

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फेफड़ों को खुली हवा न मिली
न मिली आपसे वफ़ा न मिली

दुश्मनी ढूँढ़-ढूंढ़ कर हारी
दोस्ती है जो लापता न मिली

वक़्त पे छोड़ दिया है सब कुछ
दर्दे-दिल की कोई दवा न मिली

हर किसी हाथ में मिला खंज़र
आपकी बात भी जुदा न मिली

है न हैरत, जहां में कोई भी
खुशी, ग़मों से आशना न मिली

सोचता है नदीश ये अक्सर
ज़िन्दगी आपके बिना न मिली



चित्र साभार-गूगल

मिला जो शख़्स

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बिछड़ते वक़्त तेरे अश्क़ का हर इक क़तरा लिपट के रास्ते से मेरे तरबतर निकला
खुशी से दर्द की आँखों में आ गए आंसू मिला जो शख़्स वो ख़्वाबों का हमसफ़र निकला
रोज दाने बिखेरता है जो परिंदों को उसके तहख़ाने से कटा हुआ शजर निकला
हर घड़ी साथ ही रहा है वो नदीश मेरे दर्द का एक पल जो खुशियों से बेहतर निकला