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Showing posts from May, 2017

मुक्तक

क्या हो जाएगा

तेरे बगैर रहा है

संवर जाने दे

ज़िस्म की खराश देखकर

मुरझाता नहीं कभी

ज़ख्म-ए-दिल मेरा मुस्कुराने लगा