Wednesday, May 31, 2017

मुक्तक


उदास-उदास सा है ज़िन्दगी का मौसम
नहीं आया, हुई मुद्दत खुशी का मौसम
दिल को बेचैन किये रहता है नदीश सदा
याद रह जाता है कभी-कभी का मौसम

प्यार की रोशनी से माहताब दिल हुआ
तेरी एक निगाह से बेताब दिल हुआ
हज़ार गुल दिल मे ख़्वाबों के खिल गए
तेरी नज़दीकियों से शादाब दिल हुआ

पल-पल बोझल था मगर कट गई रात
सहर के उजालों में सिमट गई रात
डरा रही थी अंधेरे के जोर पर मुझे
जला जो दिले-नदीश तो छंट गई रात

ये करिश्मा मोहब्बत में होते देखा
लब पे हँसी आँख को रोते देखा
गुजरे है मंज़र भी अजब आँखों से
साहिल को कश्तियां डुबोते देखा

पानी से है बिल्कुल खाली सूरत
लोग लिये फिरते हैं जाली सूरत
खाते हैं अक्सर फ़रेब चेहरे से
देखकर सब ये भोली-भाली सूरत

तेरे ही साथ को साँसों का साथ कहता हूँ
तुझी को 'मैं' तुझी को कायनात कहता हूँ
तेरी पनाह में गुजरे जो चंद पल मेरे
बस उन्हीं लम्हों को सारी हयात कहता हूँ


रेखाचित्र-अनुप्रिया

Friday, May 26, 2017

क्या हो जाएगा

तुम न होगे तो यूँ भी क्या हो जाएगा
कुछ नए ज़ख्मों से राब्ता हो जाएगा

उसको भी तसीरे-उल्फ़त देगी बदल
बेवफ़ा हो तो बावफ़ा हो जाएगा

सीख ली उसने मौसम की अदा
हँसते-हँसते ही वो खफ़ा हो जाएगा


चाहतें अपनी हमने तो कर दी निसार
क्या पता था वो बेवफ़ा हो जाएगा

दर्द मिलते रहें तो न घबरा ऐ दिल
दर्द भी तो कभी दवा हो जाएगा

आप कहें तो कभी मुझको अपना नदीश
दिल क्या ईमान भी आपका हो जाएगा

Wednesday, May 24, 2017

तेरे बगैर रहा है


किस्मत को तो मुझसे पुराना बैर रहा है
हर वक़्त तू भी तो खफा सा खैर रहा है

हासिल यही है तज़र्बा-ए-ज़िन्दगी मुझे
 किरदार तो अपनों में मेरा गैर रहा है

फिरता रहा बारे-अना लिए तमाम उम्र
बनकर के लाश जो पानी में तैर रहा है

पल भर की जुदाई में दिए हैं हज़ार तंज़
कैसे  नदीश  ये  तेरे  बगैर  रहा  है

Sunday, May 21, 2017

संवर जाने दे


अपनी आँखों के आईने में संवर जाने दे
मुझे समेट ले आकर या बिखर जाने दे

मेरी नहीं है तो ये कह दे ज़िन्दगी मुझसे
चंद सांसें करूँगा क्या मुझे मर जाने दे

दर्द ही दर्द की दवा है लोग कहते हैं
दर्द कोई नया जिगर से गुजर जाने दे

यूँ नहीं होता है इसरार से हमराह कोई
गुजर जायेगा तनहा ये सफ़र जाने दे

नदीश आएगा कभी तो हमसफ़र तेरा
जहाँ भी जाये मुन्तज़िर ये नज़र जाने दे

चित्र साभार-गूगल

Thursday, May 18, 2017

ज़िस्म की खराश देखकर


ख़्वाबे-वफ़ा के ज़िस्म की खराश देखकर
इन आँसुओं की बिखरी हुई लाश देखकर
जब से चला हूँ मैं कहीं ठहरा न एक पल
राहें भी रो पड़ीं मेरी तलाश देखकर


मुरझाता नहीं कभी


आँख से चेहरा तेरा जाता नहीं कभी
दिल भूल के भी भूलने पाता नहीं कभी
हो धूप ग़म की या कि हो अश्क़ों की बारिशें
फूल तेरी यादों का मुरझाता नहीं कभी
★★★

Thursday, May 11, 2017

ज़ख्म-ए-दिल मेरा मुस्कुराने लगा

वार जब भी तेरा याद आने लगा
ज़ख्म-ए-दिल मेरा मुस्कुराने लगा

लाखों दर्द अपने दिल मे छिपाये हुए
अपने चेहरे पे खुशियां सजाये हुए
खो गया मैं रिवाजों की इस भीड़ में
और खुद से ही खुद को छिपाने लगा

ज़ख्म ख्वाबों के रिसते रहे रातभर
दर्द कदमों पे बिछते रहे रातभर
तेरे वादों के जख्मों पे फिर मैं सनम
तेरी यादों का मरहम लगाने लगा

धूप खिलवत की तन को भिगोती रही
चाहतें रात भर मेरी रोती रही
फिर भी पतवार उम्मीद की थामकर
सब्र की धार मैं आजमाने लगा

हर खुशी को क्यूँ मुझसे ही तकरार था
क्यूँ निशाने पे ग़म के मैं हर बार था
जब भी, जो भी रुचा छिन गया मुझसे वो
जो मेरा था मुझे मुंह चिढ़ाने लगा