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Showing posts from June, 2017

तुम कभी आओ तो

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तुम कभी आओ तो
मैं घुमाऊँ तुमको
खण्डहर सी ज़िन्दगी के
उस कोने में जहाँ
अब भी पड़ीं हैं
अरमानों की अधपकी ईंटें
ख़्वाबों के अधजले टुकड़े
अहसास का बिखरा मलबा
उम्मीद का भुरभुरा गारा
तुम कभी आओ तो
मैं दिखाऊँ तुमको
खुशियों की बेरंग तस्वीरें
अश्कों का लबालब पोखर
धोखों के घने जाले
रिश्तों की चौड़ी दरारें
तुम कभी आओ तो

*रेखाचित्र-अनुप्रिया

पतझड़ के बाद की बहार

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शेष भाग...
अपने कमरे पहुंच के मनु की आँखे नम हो गई। उसके कानों में बार-बार पापा की बात ही गूँज रही थी। उसने जैसे तैसे खुद को सयंत किया। इतने आर्ष का फोन आ गया, लेकिन उसने काट दिया। इधर फोन कटने से आर्ष भी परेशान हो रहा था। उधर विनय मनु और आर्ष के रिश्ते को लेकर परेशान था। उसे सिर्फ दोनों परिवारों के बीच जो बड़ा आर्थिक अंतर था, वो बात परेशान किए जा रही थी। जैसे तैसे ये दिन गुज़र गया। दूसरे दिन उसने महसूस किया कि मनु गुमसुम है, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा, वहीं मनु पूरी कोशिश कर रही थी कि वो सामान्य नज़र आये। इसी तरह कुछ दिन बीत गए। अगले रविवार को आर्ष का फोन विनय के पास आया... हेलो अंकल मैं आर्ष बोल रहा हूँ हाँ कहो आर्ष.. विनय ने सामान्य होते हुए कहा मेरे मम्मी-पापा आपसे मिलना चाहते हैं, आर्ष ने जवाब दिया लेकिन... कुछ कहते हुए विनय रुक गया और फिर कहा ठीक है, कब मिलने आ रहे हो आज शाम ही, आर्ष ने जवाब दिया आज शाम, विनय ने हड़बड़ाते हुए कहा हाँ, आप परेशान न होइए और कुछ तामझाम करने की भी जरूरत नहीं,  हम लोग शाम 7 बजे आएंगे..आर्ष बोला और फोन काट दिया फोन कटने के विनय ने अरु को आवाज़ दी... अरु कहाँ ह…

पतझड़ के बाद की बहार

क्या हुआ इतना परेशान क्यों हो?
अरे कुछ नहीं अरु, वो मेरा दोस्त है न प्रकाश उसकी बेटी ...
क्या हुआ उसको?
अरे हुआ कुछ नहीं, वो किसी लड़के को पसंद करती थी और दो दिन पहले ही उसने घर में किसी को बताए बिना मंदिर में शादी कर ली।
ओह्ह, ये तो बहुत बुरा हुआ, ये आजकल के बच्चे भी न, माँ बाप की बिल्कुल फिक्र नहीं है इनको। ऐसे मामलों में संबंध भी बिगड़ते हैं और घर की इज्ज़त भी जाती रहती है।
हाँ सच कहा लेकिन क्या करें अरु, आजकल के बच्चे पढ़ लिख कर खुद को इतना समझदार समझने लगते हैं, ज़िन्दगी के बड़े फैसलों में भी माँ-बाप से सलाह नहीं लेते।
हाँ सच कहा विनय तुमने।
अरे अब तुम क्यों उदास हो, विनय ने अरु से पूछा
हमारी भी बेटी है, पता नहीं क्या होगा बड़ा खराब समय चल रहा है। मुझे तो बहुत चिंता हो रही है, सुनो मनु की पढ़ाई पूरी होते ही उसकी शादी कर देंगे। हाँ अभी से अच्छा सा लड़का देखना शुरू कर दो।
अरे तुम तो बेकार परेशान हो रही हो, विनय ने अरु का हाथ पकड़ते हुए कहा। ज्यादा सोचना सेहत के लिए खराब है,  वैसे हमारी मनु बहुत समझदार है, अच्छा अब मेरे लिए एक कप चाय बना दो।
अरु के जाते ही विनय भी सोचने लगा, आखिर अरु ठीक ही …

आशाओं के दीप जलायें

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निराशाओं के घोर तमस में आशाओं के दीप जलायें
भावनाओं से उसे सींच कर अपनेपन का पेड़ लगायें

अभिनंदित हो जहाँ भावना और प्यार से जग सुरभित हो
राग-द्वेष से रहित हृदय में कोमलता ही स्पंदित हो
दुनिया के हर छद्म भूलकर सबको अपना मीत बनायें
आँखों में आकाश बसा हो और प्रकाशित हों सब राहें
सबको अपने गले लगाने प्रस्तुत हो हरदम ये बांहें
जो अपनी गलती पर टोके, उसको अपने पास बिठायें

अपना हो या कोई पराया, प्रेम सदा बातों में छलके
अपनी खामी पर हँस लें हम, ग़ैर के ग़म में आंसू ढलके
आओ मिलकर यही बात हम, सारी दुनिया को समझायें
*रेखचित्र-अनुप्रिया

पर्यावरण दिवस

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आज सारी दुनिया विश्व पर्यावरण दिवस मना रही है, अच्छी बात है मनाना भी चाहिए, लेकिन क्या पर्यावरण की फिक्र करने के लिए सिर्फ 24 घंटे काफी हैं। आप सब भी समझते हैं कि नहीं है, हमें अपनी हर सांस के साथ पर्यावरण की चिंता होनी चाहिए, क्योंकि हम सांसों के माध्यम से जो आक्सीजन अपने शरीर में भर रहे हैं, वो पर्यावरण का महत्वपूर्ण हिस्सा है। हमें पानी पीते समय पर्यावरण की चिंता करनी चाहिए, क्योंकि हम जो पानी पी रहे हैं वो भी पर्यावरण का हिस्सा है। हमें सुंदर प्राकृतिक दृश्यों का आनंद लेते समय पर्यावरण की चिंता करनी चाहिए, क्योंकि ये सब भी पर्यावरण का हिस्सा है, यानि की हमें हर पल पर्यावरण की चिंता करनी चाहिए। 
पर्यावरण यानि पर्या जो हमारे चारों ओर है और आवरण जो हमें चारों ओर से घेरे हुये है। इसका सीधा मतलब है कि हम जिस आवरण से जन्म से लेकर मृत्युपर्यंत तक घिरे रहते हैं और इसका प्रत्येक अंश हमारे लिए जीवनोपयोगी है, फिर भी हम उसे नुकसान पहुंचाने में जरा भी संकोच नहीं करते। हम ये तो नहीं सोचते कि हम प्रकृति के जिन अंशों को क्षति पहुंचा रहे हैं, उनके न होने पर हमारी मृत्यु निश्चित है, लेकिन क्या करे…

तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश

कई दिन से चुप तेरी यादों के पंछी
फिर सहन-ए-दिल में चहकने लगे हैं ख़्वाबों के मौसम भी आकर हमारी आँखों मे फिर से महकने लगे हैं
उमंगों की सूखी नदी के किनारे आशाओं की नाव टूटी पड़ी है तपती हुई रेत में ज़िन्दगी की हमारी उम्मीदों की बस्ती खड़ी है ज़मीं देखकर दिल की तपती हुई ये अश्क़ों के बादल बरसने लगे हैं
हर एक शाम तन्हाइयों में हमारी मौसम तुम्हारी ही यादें जगाये तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश मुहब्बत का मुरझाया गुलशन सजाये पाकर के अपने ख्यालों में तुमको अरमान दिल के मचलने लगे हैं
ज़ेहन में तो बस तुम ही तुम हो हमारे मगर दिल को अब तुमसे निस्बत नहीं है तुम्हें चाहते हैं बहुत अब भी लेकिन है सच अब तुम्हारी जरूरत नहीं है भुला दें तुम्हें या न भूलें तुम्हें हम खुद से ही खुद अब उलझने लगे हैं

आँखों का पानी लिखता हूँ

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शब्दों की ज़ुबानी लिखता हूँ
गीतों की कहानी लिखता हूँ
दर्दों के विस्तृत अम्बर में भावों के पंक्षी उड़ते हैं नाचें हैं शरारे उल्फ़त के जब तार ह्रदय के जुड़ते हैं हर सुबह से शबनम लेकर फिर शाम सुहानी लिखता हूँ
जब दर्द से जुड़ता है रिश्ता हर बात प्रीत से होती है तब भावनाओं के धागे में अश्क़ों को आँख पिरोती है ऐसे ही अपनेपन को मैं रिश्तों की निशानी लिखता हूँ पानी में आँखों के भीतर ये नमक ग़मों का घुलता है जब नेह की होती है बारिश तब मैल ह्रदय का धुलता है दरिया से निर्मल जल सा मैं आँखों का पानी लिखता हूँ 
*रेखाचित्र-अनुप्रिया

अनुरागों का किल्लोल कहाँ

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ये सहज प्रेम से विमुख ह्रदय क्यों अपनी गरिमा खोते हैं समझौतों पर आधारित जो वो रिश्ते भार ही होते हैं
क्षण-भंगुर से इस जीवन सा हम आओ हर पल को जी लें जो मिले घृणा से, अमृत त्यागें और प्रेम का विष पी लें स्वीकारें वो ही उत्प्रेरण, जो बीज अमन के बोते हैं
आशाओं का दामन थामे हर दुःख का मरुथल पार करें इस व्यथित हक़ीकत की दुनिया में  सपनो को साकार करें सुबह गए पंक्षी खा-पीकर, जो शाम हुई घर लौटे हैं
जो ह्रदय, हीन है भावों से उसमें निष्ठा का मोल कहाँ उसके मानस की नदिया में अनुरागों का किल्लोल कहाँ है जीवित, जो दूजे दुख में अपने एहसास भिगोते हैं  *रेखाचित्र-अनुप्रिया

संवरती रही ग़ज़ल

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ख़्वाबे-वफ़ा के ज़िस्म की खराश देखकर
इन आँसुओं की बिखरी हुई लाश देखकर
जब से चला हूँ मैं कहीं ठहरा न एक पल
राहें भी रो पड़ीं मेरी तलाश देखकर
.
आँख से चेहरा तेरा जाता नहीं कभी
दिल भूल के भी भूलने पाता नहीं कभी
हो धूप ग़म की या कि हो अश्क़ों की बारिशें
फूल तेरी यादों का मुरझाता नहीं कभी
.
जो आँखों से आंसू झरे, देख लेते नज़र इक मुझे भी  अरे, देख लेते
हुए गुम क्यूँ आभासी रंगीनियों में
मुहब्बत,  बदन  से  परे, देख लेते
.
जब भी मेरे ज़ेह्न में संवरती रही ग़ज़ल 
तेरे ही ख़्यालों से महकती रही ग़ज़ल
झरते रहे हैं अश्क़ भी आँखों से दर्द की 
और उँगलियां एहसास की लिखती रही ग़ज़ल
.
ख़िल्वत की पोशीदा पीर भेजी है तुमको ख़्वाबों की ताबीर भेजी है
रंग मुहब्बत का थोड़ा सा भर देना
यादों की बेरंग कुछ तस्वीर भेजी है
.
उदास-उदास सा है ज़िन्दगी का मौसम
नहीं आया हुई मुद्दत खुशी का मौसम
दिल कॊ बेचैन किये रहता है नदीश सदा
याद रह जाता है कभी-कभी का मौसम . सांसों की फिसलती हुई ये डोर थामकर
बेताब दिल की घड़कनों का शोर थामकर
करता हूँ इंतज़ार इसी आस में कि तुम
आओगी कभी तीरगी में भोर थामकर
.
लब पे लबों की छुअन का एहसास रहने दो
बस एक पल तो खुद को , मेरे पास र…

दर्द कोई बोलता हुआ

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ये तेरी जुस्तजू से मुझे तज़ुर्बा हुआ
मंज़िल हुई मेरी न मेरा रास्ता हुआ

खुशियों को कहीं भी न कभी रास आऊँ मैं
हाँ सल्तनत में दर्द की ये फैसला हुआ

मिट ना सकेगा ये किसी सूरत भी अब कभी
नज़दीकियों के दरम्यान जो फासला हुआ

जब से खँगालने चले तहखाने नींद के
अश्क़ों की बगावत में ख़्वाब था डरा हुआ

अक्सर ये सोचता हूँ क्या है मेरा वज़ूद
मैं एक अजनबी से बदन में पड़ा हुआ

थी ज़िंदगी की कश्मकश कि होश गुम गए
कहते हैं लोग उसको कि वो सिरफिरा हुआ

है मेरा अपना हौसला परवाज़ भी मेरी
मैं एक परिन्दा हूँ मगर पर कटा हुआ

मजबूरियों ने मेरी न छोड़ा मुझे कहीं
मत पूछना ये तुझसे मैं कैसे जुदा हुआ

अब थम गया नदीश तेरी ख़िल्वतों का शोर
हाँ मिल गया है दर्द कोई बोलता हुआ
रेखाचित्र-अनुप्रिया

समय वही क्यों दिखलाता है

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व्याकुल हो जब भी मन मेरा तब-तब गीत नया गाता है आँखों में इक सपन सलोना  चुपके-चुपके आ जाता है
जोड़-जोड़ के तिनका-तिनका  नन्हीं चिड़िया नीड़ बनती मिलकर बेबस-बेकस चीटी इक ताकतवर भीड़ बनती छोटी-छोटी खुशियाँ जी लो यही तो जीवन कहलाता है

जीवन के सारे रंगों से  भीग रहा है मेरा कण-कण मुझे कसौटी पर रखकर ये समय परखता है क्यूँ क्षण-क्षण गड़ता है जो भी आँखों में समय वही क्यों दिखलाता है

जाने किस पल हुआ पराया वो भी तो मेरा अपना था  रिश्ता था कच्चे धागों का मगर टूटना इक सदमा था घातों से चोटिल मेरा मन आज बहुत ही घबराता है
रेखाचित्र-अनुप्रिया