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Showing posts from June, 2017

संवारा नहीं होता

जलते शहर से

तुम कभी आओ तो

आँखों में छिपाये रखना

पतझड़ के बाद की बहार

बेक़रार बहुत थे

आँख में आंसू आये हैं

चंद अशआर

मगर चाहता हूँ

संवरना है अभी

पतझड़ के बाद की बहार

आशाओं के दीप जलायें

पर्यावरण दिवस

तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश

आँखों का पानी लिखता हूँ

अनुरागों का किल्लोल कहाँ

संवरती रही ग़ज़ल

दर्द कोई बोलता हुआ

समय वही क्यों दिखलाता है