न तारे, चाँद, गुलशन औ' अम्बर बनाने में
जरूरी जिस कदर है सावधानी घर बनाने में
अचानक अश्क़ टपके और बच गई आबरू वरना
कसर छोड़ी न थी उसने मुझे पत्थर बनाने में
मैं सारी उम्र जिनके वास्ते चुन-चुन के लाया गुल
वो ही मसरूफ़ थे मेरे लिए खंज़र बनाने में
आप घर बनाने और रिश्ते निभाने की मेहनत को बहुत सटीक तरह से जोड़ते हैं। पहली पंक्ति में ज़िम्मेदारी का भार साफ दिखता है। दूसरी पंक्ति में आँसू आबरू बचा लेते हैं, यह बात बहुत गहरी चोट करती है। तीसरी पंक्ति तो और भी कड़वी सच्चाई रख देती है, जहाँ जिनके लिए फूल चुने, वही खंजर गढ़ते दिखते हैं।
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