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ज़िन्दगी की किताब के पन्ने

आँखों में 
फिर चमकने लगे हैं 
यादों के कुछ लम्हें
गूंजने लगी हैं कान में 
वो तमाम बातें 
जो कभी हमने की ही नहीं 
नज़र आई कुछ तस्वीरें 
जो वक़्त ने खींच ली होगी 
और तुम्हारा ही नाम 
पढ़ रहा था हर कहीं 
जब पलट रहा था मैं 
ज़िन्दगी की किताब के पन्ने


तुम कभी आओ तो


तुम कभी आओ तो
मैं घुमाऊँ तुमको
खण्डहर सी ज़िन्दगी के
उस कोने में जहाँ
अब भी पड़ीं हैं
अरमानों की अधपकी ईंटें
ख़्वाबों के अधजले टुकड़े
अहसास का बिखरा मलबा
उम्मीद का भुरभुरा गारा

तुम कभी आओ तो
मैं दिखाऊँ तुमको
खुशियों की बेरंग तस्वीरें
अश्कों का लबालब पोखर
धोखों के घने जाले
रिश्तों की चौड़ी दरारें

तुम कभी आओ तो
मैं बताऊँ तुमको
तन्हाई की अनकही बातें
आँखों में छिपे जगराते
खामोशियों के चुभते खंज़र
वीरानियों के बिखरे मंज़र
तुम कभी आओ तो

आशाओं के दीप जलायें

निराशाओं के घोर तमस में आशाओं के दीप जलायें
भावनाओं से उसे सींच कर अपनेपन का पेड़ लगायें

अभिनंदित हो जहाँ भावना और प्यार से जग सुरभित हो
राग-द्वेष से रहित हृदय में कोमलता ही स्पंदित हो
दुनिया के हर छद्म भूलकर सबको अपना मीत बनायें

आँखों में आकाश बसा हो और प्रकाशित हों सब राहें
सबको अपने गले लगाने प्रस्तुत हो हरदम ये बांहें
जो अपनी गलती पर टोके, उसको अपने पास बिठायें

अपना हो या कोई पराया, प्रेम सदा बातों में छलके
अपनी खामी पर हँस लें हम, ग़ैर के ग़म में आंसू ढलके
आओ मिलकर यही बात हम, सारी दुनिया को समझायें

तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश

कई दिन से चुप तेरी यादों के पंछी
फिर सहन-ए-दिल में चहकने लगे हैं
ख़्वाबों के मौसम भी आकर हमारी
आँखों मे फिर से महकने लगे हैं

उमंगों की सूखी नदी के किनारे
आशाओं की नाव टूटी पड़ी है
तपती हुई रेत में ज़िन्दगी की
हमारी उम्मीदों की बस्ती खड़ी है
ज़मीं देखकर दिल की तपती हुई ये
अश्क़ों के बादल बरसने लगे हैं

हर एक शाम तन्हाइयों में हमारी
मौसम तुम्हारी ही यादें जगाये
तुम्हारे ख्यालों की रिमझिम सी बारिश
मुहब्बत का मुरझाया गुलशन सजाये
पाकर के अपने ख्यालों में तुमको
अरमान दिल के मचलने लगे हैं

ज़ेहन में तो बस तुम ही तुम हो हमारे
मगर दिल को अब तुमसे निस्बत नहीं है
तुम्हें चाहते हैं बहुत अब भी लेकिन
है सच अब तुम्हारी जरूरत नहीं है
भुला दें तुम्हें या न भूलें तुम्हें हम
खुद से ही खुद अब उलझने लगे हैं


आँखों का पानी लिखता हूँ

शब्दों की ज़ुबानी लिखता हूँ
गीतों की कहानी लिखता हूँ

दर्दों के विस्तृत अम्बर में
भावों के पंक्षी उड़ते हैं
नाचें हैं शरारे उल्फ़त के
जब तार ह्रदय के जुड़ते हैं
हर सुबह से शबनम लेकर
फिर शाम सुहानी लिखता हूँ

जब दर्द से जुड़ता है रिश्ता
हर बात प्रीत से होती है
तब भावनाओं के धागे में
अश्क़ों को आँख पिरोती है
ऐसे ही अपनेपन को मैं
रिश्तों की निशानी लिखता हूँ

पानी में आँखों के भीतर
ये नमक ग़मों का घुलता है
जब नेह की होती है बारिश
तब मैल ह्रदय का धुलता है
दरिया से निर्मल जल सा मैं
आँखों का पानी लिखता हूँ 

अनुरागों का किल्लोल कहाँ

ये सहज प्रेम से विमुख ह्रदय
क्यों अपनी गरिमा खोते हैं
समझौतों पर आधारित जो
वो रिश्ते भार ही होते हैं

क्षण-भंगुर से इस जीवन सा हम
आओ हर पल को जी लें
जो मिले घृणा से, अमृत त्यागें
और प्रेम का विष पी लें
स्वीकारें वो ही उत्प्रेरण, जो
बीज अमन के बोते हैं

आशाओं का दामन थामे
हर दुःख का मरुथल पार करें
इस व्यथित हक़ीकत की दुनिया में 
सपनो को साकार करें
सुबह गए पंक्षी खा-पीकर, जो
शाम हुई घर लौटे हैं

जो ह्रदय, हीन है भावों से
उसमें निष्ठा का मोल कहाँ
उसके मानस की नदिया में
अनुरागों का किल्लोल कहाँ
है जीवित, जो दूजे दुख में
अपने एहसास भिगोते हैं