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Showing posts from February, 2017

पलकों की नमी अच्छी लगी

आदमी की तरह

नाम पे मेरे

तलाश हो गया

रूठ के जाना किसी का

श्रृंगार ख़्वाबों का

यूँ मुसलसल ज़िन्दगी से

ठंडी हवा की आँच

ख़ुशी कम दिखती है

जेवर बनाता हूँ

है अपनी जगह

घटा से धूप से और चांदनी से चाहते क्या हो?

आंसू अपनी आँख में

नींद का बिस्तर नहीं मिला

देखते देखते

मुहब्बत के सफ़र से

आँखों में छिपाए रखना