Monday, June 19, 2017

तुम कभी आओ तो

तुम कभी आओ तो
मैं घुमाऊँ तुमको
खण्डहर सी ज़िन्दगी के
उस कोने में जहाँ
अब भी पड़ीं हैं
अरमानों की अधपकी ईंटें
ख़्वाबों के अधजले टुकड़े
अहसास का बिखरा मलबा
उम्मीद का भुरभुरा गारा
तुम कभी आओ तो
मैं दिखाऊँ तुमको
खुशियों की बेरंग तस्वीरें
अश्कों का लबालब पोखर
धोखों के घने जाले
रिश्तों की चौड़ी दरारें
तुम कभी आओ तो

*रेखाचित्र-अनुप्रिया

6 comments:

  1. सुंदर अभिव्यक्ति लोकेश जी

    ReplyDelete
  2. बहुत खूब ... कलेजा बड़ा कर के आना होगा उन्हें ... दिल का दर्द देखना आसान कहाँ होगा ...

    ReplyDelete
  3. बेहद मर्मस्पर्शी रचना ...,

    ReplyDelete
    Replies
    1. बेहद आभार आदरणीया

      Delete