आँख में ठहरा हुआ

वस्ल की शब का है मंज़र आँख में ठहरा हुआ
एक सन्नाटा है सारे शहर में फैला हुआ

दोस्ती-ओ-प्यार की बातें जो की मैंने यहाँ
किस कदर जज़्बात का फिर मेरे तमाशा हुआ

क्यों मैं समझा था सभी मेरे हैं औ' सबका हूँ मैं
सोचता हूँ जाल में रिश्तों के अब उलझा हुआ

फुसफुसा कर क्या कहा जाने ख़ुशी से दर्द ने
आंसुओं के ज़िस्म का हर ज़ख्म है सहमा हुआ

रिस रही थी दर्द की बूंदें भी लफ़्ज़ों से नदीश
घर मेरे अहसास का था इस कदर भीगा हुआ

पलकों की नमी अच्छी लगी



याद के त्यौहार को तेरी कमी अच्छी लगी

बात, तपते ज़िस्म को ये शबनमी अच्छी लगी

 इसलिये हम लौट आये प्यास लेकर झील से

खुश्क लब को नीम पलकों की नमी अच्छी लगी

आदमी की तरह

प्यार हमने किया जिंदगी की तरह
आप हरदम मिले अजनबी की तरह

मैं भी इन्सां हूँ, इन्सान हैं आप भी
फिर क्यों मिलते नहीं आदमी की तरह

मेरे सीने में भी इक धड़कता है दिल
प्यार यूँ न करें दिल्लगी की तरह

दोस्त बन के निभाई है जिनसे वफ़ा
दोस्ती कर रहे हैं दुश्मनी की तरह

हमको कोई गिला ग़म से होता नहीं
ग़र ख़ुशी कोई मिलती ख़ुशी की तरह

आज फिर से मेरे दिल ने पाया सुकूं
सोचकर आपको शायरी की तरह

ग़म की राहों में जब भी अँधेरे बढ़े
अश्क़ बिखरे सदा चांदनी की तरह

काश दिल को तुम्हारे ये आता समझ
इश्क़ मेरा नहीं हर किसी की तरह

याद आई है जब भी तुम्हारी नदीश
तीरगी में हुई रौशनी की तरह

नाम पे मेरे

अपनी आंखों से मुहब्बत का बयाना कर दे 

नाम  पे  मेरे  ये  अनमोल  खज़ाना  कर दे

सिमटा रहता है किसी कोने में बच्चे जैसा

मेरे  अहसास को  छू  ले  तू  सयाना कर दे

तलाश हो गया



जो मेरा था तलाश हो गया

हाँ यक़ीन था काश हो गया

मेरी आँखों में चहकता था

परिंदा ख़्वाबों का लाश हो गया

रूठ के जाना किसी का

दूर हमने यूँ तीरगी कर ली
जला के दिल को रौशनी कर ली

दोस्ती है फ़रेब जान के ये
जो मिला उससे दुश्मनी कर ली

ज़िन्दगी कैसे रहबरी करती
मौत ने मेरी रहज़नी कर ली

इसलिए हो गए खफ़ा आंसू
सिर्फ उम्मीद-ए-ख़ुशी कर ली

गिर गए आईने की आँखों से
अक्स ने जैसे ख़ुदकुशी कर ली

रूठ के जाना किसी का ऐ नदीश
रूह ने जैसे बेरुख़ी कर ली

श्रृंगार ख़्वाबों का


●●■◆■◆■●●
 रंग भरूँ शोख़ी में आज शबाबों का
रुख़ पे तेरे मल दूँ अर्क गुलाबों का
होंठो का आलिंगन कर यूँ होंठो से,
हो जाए श्रृंगार हमारे ख़्वाबों का
●●■◆■◆■●●