लोकराग
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सुबकते रहते हैं
याद से बारहा तेरी उलझते रहते हैं
सिमटते रहते हैं या फिर बिखरते रहते हैं
तेरा ख़याल भी छू ले अगर ज़ेहन को मेरे
रात दिन दोपहर हम तो महकते रहते हैं
इसलिये ही बनी रहती है नमी आँखों में
ख़्वाब कुछ छुपके पलक में सुबकते रहते हैं
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