Wednesday, July 26, 2017

मौसम दिखाई देता है



कितना ग़मगीन ये आलम दिखाई देता है
हर जगह दर्द का मौसम दिखाई देता है

दिल को आदत सी हो गई है ख़लिश की जैसे
अब तो हर खार भी मरहम दिखाई देता है

तमाम रात रो रहा था चाँद भी तन्हा
ज़मीं का पैरहन ये नम दिखाई देता है

न आ सका तुझे अश्क़ों को छिपाना अब तक
हँसी के साथ-साथ ग़म दिखाई देता है

जहाँ पे दर्द ने जोड़े नहीं कभी रिश्ते
वहाँ का जश्न भी मातम दिखाई देता है

ग़मों की दास्तां किस को सुनाता मैं नदीश
न हमनवां है न हमदम दिखाई देता है

चित्र साभार- गूगल