कहकशां बनाते हैं


पोशीदा बातों को सुर्खियां बनाते हैं
लोग कैसी-कैसी ये कहानियां बनाते हैं

जिनमें मेरे ख़्वाबों का नूर जगमगाता है
वो मेरे आंसू इक कहकशां बनाते हैं


फासला नहीं रक्खा जब बनाने वाले ने
क्यों ये दूरियां फिर हम दरम्यां बनाते हैं

फूल उनकी बातों से किस तरह झरे बोलो
जो सहन में कांटों से गुलसितां बनाते हैं

.

जब नदीश जलाती है धूप इस ज़माने की
हम तुम्हारी यादों से सायबां बनाते हैं

चित्र साभार- गूगल

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