Saturday, July 22, 2017

जुगनू से बिखर जाते हैं

जब भी यादों में सितमगर की उतर जाते हैं 
काफ़िले दर्द के इस दिल से गुज़र जाते हैं

तुम्हारे नाम की हर शै है अमानत मेरी 
अश्क़ पलकों में ही आकर के ठहर जाते हैं

किसी भी काम के नहीं ये आईने अब तो
अक्स आँखों में देखकर ही संवर जाते हैं

इस कदर तंग है तन्हाईयाँ भी यादों से
रास्ते भीड़ के तनहा मुझे कर जाते हैं

देखकर तीरगी बस्ती में उम्मीदों की मिरे
अश्क़ ये टूटकर जुगनू से बिखर जाते हैं

बसा लिया है दिल में दर्द को धड़कन की तरह
ज़ख्म, ये वक़्त गुजरता है तो भर जाते हैं

खिज़ां को क्या कभी ये अफ़सोस हुआ होगा
उसके आने से ये पत्ते क्यों झर जाते हैं

बुझा के रहते हैं दिये जो उम्मीदों के नदीश
रह-ए-हयात में होते हुए मर जाते हैं 

चित्र साभार- गूगल