औलाद का फर्ज़

नहीं अब तुम्हें नौकरी नहीं मिल सकती...
ऐसा न कहो सेठ जी नौकरी न रही तो मैं और मेरा परिवार भूखा मर जायेगा...मुन्ना ने गिड़गिगते हुए चमन सेठ से कहा।
चमन सेठ-तो बिना बताए आठ महीने कहाँ चला गया था, इतने दिन पेट कैसे भरा तेरा, अब तुझे नौकरी नहीं मिलेगी मुन्ना, मैंने दूसरा आदमी रख लिया है।
ऐसा न करो सेठ जी, मैं कहाँ जाऊंगा, सालों तक आपके यहां नौकरी की है, अब दूसरा ठिकाना कहाँ ढूँढू, मुन्ना फिर गिड़गिड़ाया।
तुझे पहले ये सब याद नहीं रहा, जो अब ये सब कह रहा है, आखिर गया कहाँ था तू, चमन सेठ ने मुन्ना को डपटते हुए कहा।
गांव चला गया था सेठ जी, पिता जी बीमार थे, उनकी सेवा करते इतने दिन गुजर गए, मुन्ना ने कहा।
चमन सेठ- अरे और कोई नहीं है घर में उनकी सेवा के लिए, जो तू आठ महीने गायब रहा।
मुन्ना-नहीं है सेठ जी, कोई नहीं मेरे सिवा। मेरे माँ-पिता ने अपना फर्ज निभाया और अब मुझे अपना फर्ज निभाना है। पिता की सेवा का अवसर मिला ये तो मेरा सौभाग्य है, ज्यादा दिन उनकी सेवा नहीं कर पाया इसका दुख है। कितने कष्ट सहकर उन्होंने मुझे पाला पोसा था।
चमन सेठ-बस कर, ये तो हर माँ-बाप का फर्ज़ होता है, इसमें नई बात क्या है।
मुन्ना-हाँ सेठ जी बच्चों का पालन पोषण हर माँ-बाप का फर्ज होता है, तो क्या औलाद का कोई फ़र्ज़ नहीं।
चमन सेठ- ठीक है, चुप कर आ जाना कल से।
मुन्ना- बहुत बहुत कृपा है आपकी सेठ जी। इतना कह कर मुन्ना चला गया।
इधर मुन्ना के जाने के बाद चमन सेठ के कान में ये शब्द हथौड़े की तरह पड़ रहे थे, तो क्या औलाद का कोई फर्ज़ नहीं। तीन महीने से उसके पिता भी तो अस्पताल में भर्ती हैं और वो तीन बार भी नहीं गया उनसे मिलने।
मुन्ना के ये शब्द चमन सेठ को बार बार बेचैन कर रहे थे, उसे रात में नींद भी अच्छे से नहीं आई।
सुबह होते ही चमन सेठ जल्दी से तैयार होकर अस्पताल पहुंचा और पिता के पैरों के पास बैठ गया। पिता ने आंख खोलकर देखा तो चमन सेठ पिता से लिपट कर फूट-फूट कर रोने लगा। पिता ने धीरे से सिर पर हाथ फेर के कहा- चमन मेरे बेटे मुझे कोई गिला नहीं तुमसे।
चमन ने कहा-मुझे क्षमा कर दो पिता जी।
इधर पिता बेटे के सिर पे हाथ फेर रहे थे, उधर आंसुओं से धुल के मन का मैल साफ हो रहा था।
*रेखाचित्र-अनुप्रिया

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