आदमी से आदमी

रखता नहीं है निस्बतें किसी से आदमी
रिश्तों को ढ़ो रहा है आजिज़ी से आदमी

धोखा फ़रेब खून-ए-वफ़ा रस्म हो गए
डरने लगा है अब तो दोस्ती से आदमी

मिलती नहीं हवा भी चराग़ों से इस तरह
मिलता है जिस तरह से आदमी से आदमी

शिकवा ग़मों का यूँ तो हर एक पल से है यहाँ
ख़ुश भी नहीं हुआ मगर ख़ुशी से आदमी

अच्छा है कि  नदीश मुकम्मल नहीं है तू
पता है कुछ नया किसी कमी से आदमी

*चित्र साभार-अनुप्रिया

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