Saturday, June 10, 2017

चंद अशआर


न तारे, चाँद, गुलशन औ' अम्बर बनाने में
जरूरी जिस कदर है सावधानी घर बनाने में

अचानक अश्क़ टपके और बच गई आबरू वरना
कसर छोड़ी न थी उसने मुझे पत्थर बनाने में

मैं सारी उम्र जिनके वास्ते चुन-चुन के लाया गुल
वो ही मसरूफ़ थे मेरे लिए खंज़र बनाने में
बिछड़ते वक़्त तेरे अश्क़ का हर इक क़तरा
लिपट के रास्ते से मेरे तर-ब-तर निकला

ख़ुशी से दर्द की आँखों में आ गए आंसू
मिला जो शख़्स वो ख़्वाबों का हम सफ़र निकला

रोज दाने बिखेरता है जो परिंदों को
उसके तहखाने से कटा हुआ शजर निकला

हर घड़ी साथ ही रहा है वो नदीश मेरे
दर्द का एक पल जो ख़ुशियों से बेहतर निकला

तस्कीन यूँ मेरे अश्क़ों को मयस्सर होगी
अपने दामन में इन्हें आज बिखर जाने दो

पांव के छालों ने लिख दी है कहानी मेरी
अब न पूछो मिरा अहवाले-सफ़र जाने दो

चित्र साभार-गूगल