तेरे बगैर रहा है


किस्मत को तो मुझसे पुराना बैर रहा है
हर वक़्त तू भी तो खफा सा खैर रहा है

हासिल यही है तज़र्बा-ए-ज़िन्दगी मुझे
 किरदार तो अपनों में मेरा गैर रहा है

फिरता रहा बारे-अना लिए तमाम उम्र
बनकर के लाश जो पानी में तैर रहा है

पल भर की जुदाई में दिए हैं हज़ार तंज़
कैसे  नदीश  ये  तेरे  बगैर  रहा  है

चित्र साभार-गूगल

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